
उरई ARTO कार्यालय में लाइसेंस के नाम पर ‘खेल’ का आरोप! सरकारी फीस से हजारों ज्यादा वसूली की शिकायत, सवालों के घेरे में व्यवस्था
क्या बिना दलाल के आम आदमी का काम आसानी से नहीं होता?
सरकारी शुल्क तय होने के बावजूद ₹2,000 से ₹4,200 तक अतिरिक्त रकम लेने के आरोपों में कितनी सच्चाई?
CCTV फुटेज और संबंधित रिकॉर्ड की जांच हो तो क्या सामने आएगा पूरा नेटवर्क?
जनपद के एआरटीओ कार्यालय उरई में ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े कार्यों को लेकर कथित अवैध वसूली की शिकायत ने परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कार्यालय के बाहर सक्रिय बताए जा रहे निजी व्यक्तियों और अंदर मौजूद कुछ कर्मचारियों के बीच कथित सांठगांठ के चलते आवेदकों से सरकारी शुल्क से अतिरिक्त रकम वसूली जा रही है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि नया ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के नाम पर निर्धारित सरकारी शुल्क के अतिरिक्त ₹2,000 से ₹3,000 तक की रकम मांगी जाती है।
वहीं कुछ मामलों में कुल भुगतान ₹3,500 से ₹4,200 तक पहुंचने का दावा किया गया है।
शिकायतकर्ताओं ने कार्यालय के बाहर सक्रिय बताए गए कुछ निजी व्यक्तियों के नाम भी शिकायत में दर्ज कराए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
रिन्यूवल से लेकर हैवी लाइसेंस तक सवाल
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बिना किसी बिचौलिए के सीधे कार्यालय पहुंचने वाले आवेदकों से भी कथित रूप से मेडिकल प्रमाणपत्र सहित विभिन्न प्रक्रियाओं के नाम पर निर्धारित शुल्क से अधिक रकम मांगे जाने की शिकायत है।
हैवी ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण में देरी होने पर भी अतिरिक्त धनराशि लिए जाने का दावा किया गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर शासन ने हर लाइसेंस सेवा की फीस निर्धारित कर रखी है तो आवेदकों से अतिरिक्त रकम किस आधार पर मांगी जा रही है?
CCTV और रिकॉर्ड की जांच से खुल सकता है राज?
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि एआरटीओ कार्यालय परिसर में लगे CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग, आवेदन संबंधी अभिलेख, फीस रसीदें और संबंधित प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
उनका दावा है कि कार्यालय में आने-जाने वाले संदिग्ध निजी व्यक्तियों की गतिविधियों की जांच से भी तस्वीर साफ हो सकती है।
बिना दलाल फाइल सख्त, भुगतान पर रास्ता आसान?
कुछ आवेदकों ने यह भी आरोप लगाया है कि बिना किसी बिचौलिए के आवेदन करने पर दस्तावेजों की छोटी-छोटी कमियों को लेकर फाइल वापस कर दी जाती है, जबकि कथित रूप से अतिरिक्त भुगतान करने पर वही प्रक्रिया आसानी से आगे बढ़ने की बात कही जाती है। हालांकि इस आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
यही वजह है कि अब सबसे बड़ा सवाल परिवहन विभाग और जिला प्रशासन से है—क्या इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी या मामला केवल शिकायतों तक सीमित रह जाएगा?
यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और यदि शिकायतों में सच्चाई मिलती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों न हो?
जनता के पैसे और सरकारी व्यवस्था से जुड़ा मामला है, इसलिए पारदर्शी जांच जरूरी है।
सवाल वही है—सरकारी शुल्क से ज्यादा रकम लेने के आरोपों की सच्चाई आखिर जांच में कब सामने आएगी?
आपकी क्या राय है?
क्या एआरटीओ कार्यालय में लाइसेंस प्रक्रिया की CCTV और अभिलेखों के आधार पर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए?
अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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Jalaun, Jalaun | Aug 4, 2026