
प्रकृति : जीवन, चेतना और ज्ञान का अनंत स्रोत, प्रकृति ज्ञान की पुस्तक है— रजत मुखर्जी।
देवघर:–अपने ही सुख-दुःख के रंग में रंगकर प्रकृति को देखा, तो क्या देखा? मनुष्य ही सब कुछ नहीं है; प्रकृति का अपना स्वतंत्र अस्तित्व और अपना विशिष्ट स्वरूप भी है।
प्रकृति से जूझकर उसे कौन पराजित कर पाया है? जो जितनी अमानवीय चेष्टाओं के साथ प्रकृति से टकराता है, प्रकृति उसे उतना ही कठोर दंड देकर पराजित कर देती है। हमारे देश की कविता में प्रकृति-प्रेम का जो परिचय मिलता है, वह उसे अन्य देशों की कविता से अलग करता है और विशिष्टता प्रदान करता है। यह प्रकृति पर प्रभुत्व स्थापित करने या उसका उपभोग करने की भावना नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ आत्मीय मिलन का भाव है।
जिस विराट प्रकृति से मनुष्य परिवेष्टित है, जिसके आलोक से उसकी आँखें सार्थक हुई हैं और जिसके उत्ताप से उसका सुवाग-प्राण स्पंदित है; जिसके जल से उसका अभिषेक होता है और जिसके अन्न से उसका जीवन संभव है; जिस प्रकृति के गगनभेदी रहस्य-प्रासाद के द्वारों से बाहर निकलकर शब्द, गंध, वर्ण और भाव के दूत मानव-चेतना को पूर्णतः जागृत करते हैं—उसी प्रकृति के बीच भारतवर्ष ने अपनी ओत-प्रोत भक्ति-वृत्ति का विस्तार कर रखा है।