
हम रात के आसमान में जितनी आकाशगंगाएं देखते हैं, उन्हें समझना आसान नहीं है। इसलिए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कदम उठाया, जो किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता है।
उन्होंने कंप्यूटर के अंदर एक पूरा वर्चुअल ब्रह्मांड बना दिया।
इस प्रोजेक्ट का नाम था Illustris। इसका आकार लगभग 350 मिलियन प्रकाश-वर्ष प्रति भुजा वाले एक विशाल घन जितना था। लेकिन सबसे दिलचस्प बात इसका आकार नहीं, बल्कि इसकी सटीकता थी।
वैज्ञानिकों ने इस वर्चुअल ब्रह्मांड की शुरुआत बिग बैंग के लगभग 1.2 करोड़ साल बाद से की। फिर कंप्यूटर ने अरबों वर्षों तक यह गणना की कि डार्क मैटर, गैस, तारे, ब्लैक होल और आकाशगंगाएं समय के साथ कैसे बनती और बदलती होंगी।
जब यह सिमुलेशन पूरा हुआ, तो इसमें बनी कई आकाशगंगाएं असली टेलीस्कोप से दिखाई देने वाली आकाशगंगाओं जैसी दिखने लगीं। यही वजह है कि इसे उस समय का पहला ऐसा वर्चुअल ब्रह्मांड माना गया, जो वास्तविक ब्रह्मांड से काफी हद तक मेल खाता था।
लेकिन यहां एक बात समझना ज़रूरी है।
यह हमारे ब्रह्मांड की डिजिटल कॉपी नहीं है। यह भौतिकी के नियमों पर आधारित एक बेहद उन्नत कंप्यूटर मॉडल है, जिसका उद्देश्य यह समझना है कि हमारा ब्रह्मांड अरबों वर्षों में कैसे विकसित हुआ।
आज इससे भी बड़े और अधिक उन्नत ब्रह्मांडीय सिमुलेशन मौजूद हैं। लेकिन Illustris ने पहली बार यह साबित किया कि कंप्यूटर के अंदर भी ऐसा ब्रह्मांड बनाया जा सकता है, जो वास्तविक अवलोकनों से काफी हद तक मेल खाए।
यानी कभी-कभी ब्रह्मांड को समझने के लिए वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में नहीं, बल्कि सुपरकंप्यूटर के अंदर एक नया ब्रह्मांड बनाना पड़ता है।
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Bihar, India | Aug 3, 2026