
भगवान को अपनी जरूरत का साधन नहीं, जीवन का मार्गदर्शक बनाइए
आज के समय में कुछ लोग धर्म, पूजा-पाठ और आस्था का सहारा लेकर समाज में अपनी छवि तो बना लेते हैं, लेकिन उनके कर्म उनकी कथनी से बिल्कुल अलग होते हैं। जुबान पर भगवान का नाम और मन में स्वार्थ—ऐसा दिखावा आखिर कब तक चलेगा?
भगवान की पूजा करना बुरी बात नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा इंसान को विनम्र, दयालु और परोपकारी बनाती है। लेकिन यदि पूजा केवल अपनी जरूरत पूरी कराने, धन-दौलत और सुख-सुविधाएं हासिल करने या लोगों को प्रभावित करने का माध्यम बन जाए, तो फिर वह आस्था नहीं, दिखावा बन जाती है।
भगवान को अपनी जरूरत के समय याद करना आसान है, लेकिन भगवान के बताए रास्ते पर चलना कठिन। सच्ची भक्ति मंदिर में सिर झुकाने के साथ-साथ उस इंसान के साथ खड़े होने में है जिसे हमारी मदद की जरूरत है। भूखे को भोजन, दुखी को सहारा, कमजोर के लिए आवाज और जरूरतमंद के लिए सहयोग—यही तो मानवता की असली पूजा है।
किसी को धोखा देकर, झूठ बोलकर या दूसरों का हक मारकर हासिल की गई दौलत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह मन को सच्चा सुख नहीं दे सकती। क्योंकि ईश्वर के सामने दिखावे की नहीं, कर्मों की कीमत होती है।
कहा भी जाता है कि भगवान उनका साथ देते हैं जो दूसरों के लिए खड़े होते हैं। इसलिए भगवान को अपनी स्वार्थपूर्ति का साधन बनाने के बजाय उन्हें अपने चरित्र का मार्गदर्शक बनाइए।
पूजा-पाठ से पहले अपने कर्मों को पवित्र कीजिए,
मंदिर जाने से पहले अपने व्यवहार को बेहतर कीजिए,
और भगवान से मांगने से पहले किसी जरूरतमंद के लिए कुछ करने का प्रयास कीजिए।
क्योंकि सच्ची आस्था वह नहीं जो केवल हाथ जोड़ना सिखाए, बल्कि वह है जो दूसरों के लिए हाथ बढ़ाना सिखाए।
अंततः यही कहना है—
भगवान को अपनी जरूरत में इस्तेमाल मत कीजिए,
बल्कि अपने जीवन को ऐसा बनाइए कि जरूरत के समय कोई इंसान आपको भगवान का भेजा हुआ सहारा समझे।