कलम की स्याही में सच की आग रहती है,
डराने से नहीं रुकती—ये हर बार बगावत लिखती है।
धमकियों से झुक जाए वो पत्रकार नहीं होता,
सच के रास्ते पर चलने वाला कभी गुनहगार नहीं होता।
मुकदमों की दीवारें भी सच को रोक नहीं पातीं,
हर बंद दरवाज़े के पीछे से आवाज़ फिर बाहर आ जाती।
जेल की सलाखें भी हौसलों को कैद नहीं कर पातीं,
कलम जब चलती है—तो सच्चाई ही इंकलाब लाती।
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Kalpi, Jalaun | Jun 21, 2026