BHANGARAM JATRA 📍KESHKAL CHATTISGARH
where tradition faith and the belief in divine justice come together 🌿🙏🏽
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के अंतर्गत केशकाल घाटी में आयोजित होने वाली भंगाराम जात्रा (Bhangaram Jatra) देश-दुनिया की अनूठी और सबसे रहस्यमयी परंपराओं में से एक है। इसे 'देवताओं की अदालत' (Deities' Court) के रूप में जाना जाता है, जहां आम लोगों की तरह देवी-देवताओं पर भी मुकदमे चलते हैं और गलत साबित होने पर उन्हें कड़े दंड दिए जाते हैं।
इस अनूठी परंपरा और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:
सर्वोच्च न्यायाधीश माता भंगाराम: इस जात्रा में आसपास के परगना और दर्जनों गांवों के देवी-देवता (प्रतीक चिह्न, डोली और आंगा देव) शामिल होते हैं। इनमें माता भंगाराम देवी को सर्वोच्च न्यायाधीश (Supreme Judge) का स्थान प्राप्त है।
देवताओं पर मुकदमे और शिकायतें: यदि किसी गांव में लगातार फसल खराब हो जाए, कोई महामारी या भयंकर बीमारी फैल जाए, या ग्रामीणों द्वारा मांगी गई मन्नतें पूरी न हों, तो ग्रामीण इसके लिए अपने क्षेत्र के देवी-देवताओं को जिम्मेदार मानते हैं। ग्रामीण अपनी इन शिकायतों को लेकर माता भंगाराम की अदालत में पहुंचते हैं।
अदालत की अनूठी प्रक्रिया: इस जन-अदालत में ग्रामीण वकीलों की भूमिका निभाते हैं और अपने देवता के खिलाफ साक्ष्य व शिकायत रखते हैं। सुनवाई के दौरान सिरहा (पुजारी) पर देवी की सवारी आती है और वे फैसला सुनाते हैं।
किस तरह की सजा दी जाती है?
यदि कोई स्थानीय देवता अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहता है या दोषी पाया जाता है, तो उसे कड़ा दंड मिलता है।
सजा के तौर पर संबंधित देवता की मूर्ति या प्रतीक चिह्न को मंदिर के पिछले हिस्से में या खुले में कुछ समय (या आजीवन) के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाता है।
कई बार गंभीर मामलों में मूर्तियों को खंडित करने (प्रतीकात्मक मृत्युदंड) जैसी परंपरा भी देखने को मिलती है।
सुधार का मौका: सजा पूरी होने के बाद जब देवता भविष्य में गांव की रक्षा करने और भलाई का वचन देते हैं, तब उन्हें वापस पूरे सम्मान के साथ उनके स्थान पर स्थापित किया जाता है।
भादो मास (भाद्रपद) के दौरान आयोजित होने वाली इस जात्रा में छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य क्षेत्रों से भी लोग इस अद्भुत आदिवासी संस्कृति और लोक-न्याय व्यवस्था को देखने पहुंचते हैं।
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Kondagaon, Chhattisgarh | Sep 25, 2026