नफरत की दीवारों को तोड़ती किशनगंज की खूबसूरत तस्वीर
यहां मोहर्रम का ताजिया हिन्दू हाथों से होता है तैयार, मुस्लिम समाज मन्नत पूरी होने पर चढ़ाता है ताजिया
कलियागंज गांव की वर्षों पुरानी परंपरा आज भी कायम, पीढ़ियां बदलीं लेकिन नहीं बदला भाईचारे का रिश्ता
राज कुमार | पोठिया/किशनगंज
देश में जहां कभी-कभी धर्म और समुदाय के नाम पर दूरियां देखने को मिलती हैं, किशनगंज जिले के पोठिया का एक छोटा सा गांव आपसी मोहब्बत और भाईचारे की ऐसी कहानी लिख रहा है, जो समाज को बड़ा संदेश देता है। यहां मोहर्रम केवल एक समुदाय का पर्व नहीं, बल्कि आपसी रिश्तों, विश्वास और वर्षों पुरानी परंपरा का प्रतीक बन चुका है।
पोठिया प्रखंड क्षेत्र के कस्बा कलियागंज पंचायत स्थित कलियागंज चकबंदी गांव में मोहर्रम के मौके पर एक अनोखी तस्वीर देखने को मिलती है। यहां मुस्लिम समुदाय द्वारा चढ़ाए जाने वाला ताजिया हिन्दू परिवारों के हाथों से तैयार किया जाता है। गांव के हिन्दू कारीगर पूरी मेहनत और लगन के साथ ताजिया को अंतिम रूप देते हैं, वहीं मुस्लिम समुदाय के लोग मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धा के साथ इसे कर्बला मैदान तक लेकर जाते हैं।
गांव के लोगों की मानें तो यह सिलसिला कोई नया नहीं है। कई पीढ़ियों से यहां यही परंपरा चली आ रही है। बुजुर्गों ने जिस भाईचारे की नींव रखी थी, उसे आज की नई पीढ़ी भी उसी सम्मान के साथ आगे बढ़ा रही है।
घर के आंगन में तैयार होता है ताजिया, रंग-बिरंगे कागजों में छिपी है रिश्तों की मिठास
मोहर्रम से कई दिन पहले ही गांव में ताजिया बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है। बांस, कागज और सजावट के सामान से धीरे-धीरे ताजिया को आकार दिया जाता है। इसमें पुरुषों के साथ घर की महिलाएं भी बराबर सहयोग करती हैं।
कारीगरों का कहना है कि उनके लिए यह केवल कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि वर्षों से निभाया जा रहा एक रिश्ता है। जिस तरह उनके पूर्वज इस काम को करते आए, उसी तरह आज वे लोग भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
यहां हिन्दू-मुस्लिम नहीं, हम सब एक परिवार की तरह रहते हैं
ताजिया बनाने वाले गंगा मालाकार बताते हैं कि कलियागंज गांव की पहचान ही आपसी प्रेम है।
उन्होंने कहा, हमारे यहां कभी कोई भेदभाव नहीं रहा। हिन्दू समाज के लोग ताजिया बनाते हैं और मुस्लिम समाज के लोग मन्नत पूरी होने पर उसे चढ़ाते हैं। ईद हो या पूजा, मोहर्रम हो या कोई दूसरा त्योहार, हम सभी एक दूसरे की खुशी और दुख में साथ खड़े रहते हैं। यही हमारे गांव की असली ताकत है।
बचपन से देखी परंपरा, अब खुद ताजिया बना रही महिलाएं
ताजिया निर्माण में जुटी महिला रीना देवी बताती हैं कि उनके परिवार में यह काम कई वर्षों से होता आ रहा है। पहले उनके ससुर और बुजुर्ग ताजिया बनाया करते थे, अब परिवार की महिलाएं भी इसमें हाथ बंटाती हैं।
उन्होंने कहा कि हम शादी के बाद से देखते आए हैं कि हमारे घर में ताजिया बनता है। इसमें हमें खुशी मिलती है। मुस्लिम परिवार हमारे बनाए ताजिया को सम्मान से लेकर जाते हैं। गांव में सभी लोग भाई की तरह रहते हैं।
वहीं दूसरी महिला कारीगर पुकता देवी ने बताया कि जब से वह इस परिवार में आईं, तब से वह भी ताजिया बनाने में सहयोग कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक काम नहीं है, यह हमारे बुजुर्गों की दी हुई परंपरा है। जब तक हमसे होगा, इसे आगे बढ़ाते रहेंगे।
मन्नत पूरी होने पर चढ़ाया जाता है ताजिया
ग्रामीण बताते हैं कि मोहर्रम के दौरान कई लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर ताजिया चढ़ाते हैं। ताजिया तैयार होने के बाद उसे पूरे सम्मान के साथ कर्बला मैदान ले जाया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
गांव के लोगों का कहना है कि यहां त्योहारों को धर्म से ज्यादा इंसानी रिश्तों से जोड़ा जाता है। यही कारण है कि हर साल मोहर्रम के समय गांव में अलग ही माहौल देखने को मिलता है।
कलियागंज की मिट्टी में ही भाईचारा बसा है
स्थानीय निवासी कृष्णा ठाकुर कहते हैं कि यह परंपरा पूरे इलाके के लिए गर्व की बात है।
मैं बचपन से देख रहा हूं कि यहां हिन्दू परिवार ताजिया बनाते हैं और मुस्लिम भाई उसे लेकर जाते हैं। कभी किसी तरह का भेदभाव नहीं हुआ। होली हो, ईद हो, पूजा हो या मोहर्रम, यहां सभी मिलकर त्योहार मनाते हैं। कलियागंज की मिट्टी में ही भाईचारा बसा है।
किशनगंज की पहचान है गंगा-जमुनी संस्कृति
गौरतलब है कि किशनगंज जिला मुस्लिम बहुल इलाका माना जाता है, लेकिन यहां की पहचान हमेशा से आपसी सौहार्द और भाईचारे की रही है। पोठिया प्रखंड का कलियागंज गांव की यह परंपरा इस बात का उदाहरण है कि रिश्ते धर्म से नहीं, बल्कि भरोसे और इंसानियत से मजबूत होते हैं।
शुक्रवार यानि आज जब मोहर्रम का ताजिया निकलेगा, तो कलियागंज गांव एक बार फिर पूरे इलाके को अमन और एकता का संदेश देता नजर आएगा।