उरई तहसील में ‘दलाल का दरबार’:
बाबू गायब, प्राइवेट शख्स चला रहा सरकारी कुर्सी — सिस्टम बेनकाब!
उरई (जालौन)
उरई तहसील अब सरकारी दफ्तर कम और दलालों का अड्डा ज्यादा नजर आने लगी है।
ताजा खुलासे ने पूरे प्रशासनिक ढांचे की पोल खोलकर रख दी है।
आरोप इतने गंभीर हैं कि अगर जांच ईमानदारी से हो जाए, तो कई कुर्सियां हिलना तय माना जा रहा है।
मामला एक ऐसे प्राइवेट व्यक्ति मुकेश वर्मा से जुड़ा है, जो बिना किसी सरकारी नियुक्ति के वर्षों से तहसील में अपना साम्राज्य चलाता आ रहा है।
हैरानी की बात यह है कि यह व्यक्ति न सिर्फ कर्मचारियों के साथ बैठता है, बल्कि खुलेआम सरकारी बाबू की कुर्सी पर कब्जा जमाकर फरियादियों के काम तय करता है — जैसे वही असली अधिकारी हो!
वीडियो वायरल, सच सामने!
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो ने इस गुप्त खेल को सार्वजनिक कर दिया है।
वीडियो में कथित तौर पर वही व्यक्ति कुर्सी पर बैठा दिखाई दे रहा है और लोगों को निर्देश देता नजर आ रहा है।
यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि सरकारी दफ्तर की हकीकत है।
दोपहर के बाद बदल जाता है ‘राज’
तहसील के अंदरखाने की मानें तो दोपहर 3 बजे के बाद असली खेल शुरू होता है।
जैसे ही संबंधित बाबू कार्यालय छोड़ता है, वैसे ही यह प्राइवेट व्यक्ति उसकी कुर्सी संभाल लेता है।
शाम होते-होते पूरा दफ्तर दलाली केंद्र में तब्दील हो जाता है, जहां काम के नाम पर खुलेआम सौदेबाजी होती है।
काम होगा, लेकिन कीमत लगेगी — यही है नियम!
आरोप है कि मुकेश वर्मा सीधे फरियादियों से संपर्क करता है और काम कराने के नाम पर मोटी रकम वसूलता है।
जो पहले दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज बताया जाता था, वही आज दलाली के दम पर लाखों की संपत्ति खड़ी कर चुका है — यह चर्चा अब तहसील से लेकर चौराहों तक गूंज रही है।
कौन दे रहा संरक्षण?
बड़ा सवाल!
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह सब बिना ऊपर की सेटिंग के कैसे संभव है?
चर्चा है कि तहसील के ही एक प्रभावशाली अधिकारी का संरक्षण इस पूरे खेल को चला रहा है।
मिश्रा जी नाम के एक अधिकारी पर भी उंगलियां उठ रही हैं, हालांकि आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
कर्मचारियों की चुप्पी भी संदिग्ध
तहसील के कई कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर माना कि उक्त व्यक्ति की कोई नियुक्ति नहीं है। फिर भी उसका वर्षों से दफ्तर में बैठना, फाइलों में दखल देना और कुर्सी पर कब्जा जमाना — यह सब बिना अंदरूनी मिलीभगत के संभव नहीं माना जा रहा।
प्रशासन की चुप्पी = मिलीभगत?
अब सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की चुप्पी पर है।
क्या अधिकारियों को इस पूरे खेल की जानकारी नहीं, या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गई हैं?
जनता पूछ रही — कब टूटेगा दलाली का किला?
आम जनता अब खुलकर सवाल कर रही है कि क्या जिलाधिकारी इस मामले में कार्रवाई करेंगे या फिर यह प्राइवेट राज यूं ही चलता रहेगा?
अगर इस मामले में सख्त जांच हुई, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे भ्रष्ट तंत्र का पर्दाफाश कर सकती है।
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Kalpi, Jalaun | Jun 9, 2026