कटिहार की यह तस्वीर सिर्फ एक फोटो नहीं, एक सवाल है—आखिर इन बच्चों का बचपन कब लौटेगा?
दीवारों की छांव में कंधों पर बोझ उठाए ये बच्चे सिर्फ प्लास्टिक या कबाड़ नहीं ढो रहे, बल्कि मजबूरियों का वजन भी उठा रहे हैं। जिस उम्र में हाथों में किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में जिंदगी ने इनके हाथों में बोरी थमा दी है। यह तस्वीर सिर्फ एक सड़क का दृश्य नहीं, बल्कि समाज से कई सवाल पूछती है—क्या इन बच्चों के सपने गरीबी की धूल में यूं ही दब जाएंगे? कटिहार की चमकती सड़कों और बढ़ते शहर के बीच यह तस्वीर उस हकीकत को सामने लाती है, जिसे अक्सर नजरें देखकर भी अनदेखा कर देती हैं। पेट की आग ने बचपन छीन लिया, और जिम्मेदारियों ने मासूमियत को समय से पहले बड़ा बना दिया। “ये बच्चे मजदूर नहीं बनना चाहते थे, हालात ने बना दिया… इनके हाथों में किताबें होतीं, अगर किस्मत इतनी बेरहम न होती।”