Public App Logo
Jansamasya
News
पुलिस
Bjp
National
Police
Bihar
India
कांग्रेस
बीजेपी
Gujarat
भाजपा
Accident
Congress
Modi
Delhi
Viral
Jharkhand
Up
Breakingnews
Narendramodi
Madhya_pradesh
उत्तरप्रदेश
Pmmodi
Rahulgandhi
यूपी
Uttarpradesh
Haryana
Cricket
Uttarakhand

जब मीडिया ने कुत्ता विवाद पर किया सवाल, तो भड़की #रेणुका_चौधरी ने किया भौं... भौं............?? #RenukaChaudhary

Jalaun, Jalaun | Dec 3, 2025

MORE NEWS

कीचड़ में फंसी स्कूल बस, पैदल निकलने को मजबूर बच्चे! उरई की करमेर रोड पर करोड़ों की सड़क पर उठे सवाल

उरई की करमेर रोड से शर्मसार कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। सड़क निर्माण के बीच बारिश के बाद रास्ता कीचड़ और दलदल में तब्दील हो गया, जिससे स्कूली बच्चों और स्थानीय लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक यह सड़क लंबे समय से बदहाल थी और निर्माण शुरू होने के बाद उन्हें राहत की उम्मीद थी। लेकिन बारिश के बाद सड़क की स्थिति और खराब हो गई। बच्चों को इसी कीचड़ से होकर स्कूल जाना पड़ रहा है और कीचड़ में बस फंसने की तस्वीरें भी सामने आई हैं।

वहीं आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक इस सड़क निर्माण कार्य की स्वीकृत लागत 4317.20 लाख रुपये यानी करीब 43.17 करोड़ रुपये बताई गई है। अनुबंध 25 फरवरी 2026 को हुआ और कार्य पूर्ण करने की निर्धारित तिथि 24 मई 2027 है।

अब सवाल यह है कि निर्माणाधीन सड़क पर जल निकासी और आवागमन की सुरक्षित व्यवस्था क्यों नहीं है? क्या निर्माण सामग्री और कार्य की गुणवत्ता की जांच हो रही है? क्या लोक निर्माण विभाग के अधिकारी मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण करेंगे?

हालांकि सड़क निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए अंतिम गुणवत्ता पर निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन बारिश के दौरान सामने आई इन तस्वीरों और स्थानीय लोगों की शिकायतों की जांच जरूर होनी चाहिए।

करमेर रोड की इस तस्वीर पर आपकी क्या राय है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को मौके पर जाकर जांच करनी चाहिए? कमेंट में बताइए।

कीचड़ में फंसी स्कूल बस, पैदल निकलने को मजबूर बच्चे! उरई की करमेर रोड पर करोड़ों की सड़क पर उठे सवाल उरई की करमेर रोड से शर्मसार कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। सड़क निर्माण के बीच बारिश के बाद रास्ता कीचड़ और दलदल में तब्दील हो गया, जिससे स्कूली बच्चों और स्थानीय लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक यह सड़क लंबे समय से बदहाल थी और निर्माण शुरू होने के बाद उन्हें राहत की उम्मीद थी। लेकिन बारिश के बाद सड़क की स्थिति और खराब हो गई। बच्चों को इसी कीचड़ से होकर स्कूल जाना पड़ रहा है और कीचड़ में बस फंसने की तस्वीरें भी सामने आई हैं। वहीं आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक इस सड़क निर्माण कार्य की स्वीकृत लागत 4317.20 लाख रुपये यानी करीब 43.17 करोड़ रुपये बताई गई है। अनुबंध 25 फरवरी 2026 को हुआ और कार्य पूर्ण करने की निर्धारित तिथि 24 मई 2027 है। अब सवाल यह है कि निर्माणाधीन सड़क पर जल निकासी और आवागमन की सुरक्षित व्यवस्था क्यों नहीं है? क्या निर्माण सामग्री और कार्य की गुणवत्ता की जांच हो रही है? क्या लोक निर्माण विभाग के अधिकारी मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण करेंगे? हालांकि सड़क निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए अंतिम गुणवत्ता पर निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन बारिश के दौरान सामने आई इन तस्वीरों और स्थानीय लोगों की शिकायतों की जांच जरूर होनी चाहिए। करमेर रोड की इस तस्वीर पर आपकी क्या राय है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को मौके पर जाकर जांच करनी चाहिए? कमेंट में बताइए।

Jalaun, Jalaun | Aug 11, 2026

19 लाख का मरघट, साल भर भी नहीं टिका और उसी की फोटो लगाकर फिर 24.50 लाख का खेल?

छिरिया सलेमपुर में सरकारी निर्माण पर बड़ा सवाल—पहले 19.43 लाख खर्च, अब उसी मरघट की फोटो लगाकर फिर लाखों की धनराशि का प्रस्ताव; रकम फिलहाल पेंडिंग

जनपद जालौन के जालौन ब्लॉक क्षेत्र की ग्राम पंचायत छिरिया सलेमपुर में सरकारी धन से बनाए गए अंत्येष्टि स्थल की हालत और सरकारी रिकॉर्ड ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
 जिस मरघट के निर्माण पर करीब 19.43 लाख रुपये खर्च होना दर्ज है, उसमें निर्माण के कुछ ही समय बाद दरारें दिखाई दे रही हैं।
 सवाल यह है कि जब निर्माण अभी नया है और उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं, तो उसी मरघट की तस्वीर लगाकर दोबारा लगभग 20 से 24.50 लाख रुपये की धनराशि के लिए रिकॉर्ड क्यों तैयार किया गया?

पहले 19.43 लाख खर्च, अब उसी जगह फिर लाखों का प्रस्ताव!

मेरी पंचायत पर उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार छिरिया सलेमपुर ग्राम पंचायत में अंत्येष्टि स्थल से जुड़े निर्माण कार्य में 19,43,879 रुपये का व्यय दर्ज है, जबकि अनुमानित लागत 20 लाख रुपये दिखाई गई है।
 कार्य को पूर्ण भी दर्शाया गया है।

लेकिन मौके पर निर्माण की स्थिति देखकर गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।
 लैंटर के नीचे की पट्टियों और निर्माण के कुछ हिस्सों में दरारें दिखाई दे रही हैं।

यानी निर्माण पुराना होने की बात नहीं, बल्कि सवाल यह है कि साल भर भी पूरा नहीं हुआ और निर्माण में दरारें कैसे आ गईं?

 सबसे बड़ा सवाल—उसी मरघट की फोटो फिर क्यों?

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस मरघट का निर्माण पहले ही हो चुका है, उसी स्थान की फोटो लगाकर ग्राम पंचायत के ऑनलाइन रिकॉर्ड में फिर एक नए कार्य के लिए लगभग 20 से 24.50 लाख रुपये की अनुमानित धनराशि दिखाई गई है।

उपलब्ध स्क्रीनशॉट में दूसरे कार्य की अनुमानित लागत 24,50,000 रुपये, पंजीकरण की तारीख 28 जुलाई 2026 और व्यय ₹0 दर्ज है।
 कार्य वर्तमान में चल रहा/प्रस्तावित स्थिति में दिखाई दे रहा है।

इसका मतलब यह है कि फिलहाल इस नए कार्य की धनराशि खर्च होना रिकॉर्ड में नहीं दिख रहा और रकम पेंडिंग स्थिति में है।

यहीं से बड़ा सवाल पैदा होता है—
जब उसी जगह पहले से करीब 19 लाख रुपये खर्च करके मरघट बनाया जा चुका है, तो फिर उसी मरघट की फोटो लगाकर दोबारा 20-24 लाख रुपये के नए कार्य का रिकॉर्ड क्यों तैयार किया गया?

अगर समय रहते सवाल नहीं उठता तो...?
आज अगर इस मामले पर सवाल नहीं उठाया जाता और रिकॉर्ड की पड़ताल नहीं की जाती, तो आशंका थी कि आने वाले दिनों में उसी स्थान पर दोबारा लाखों रुपये की धनराशि स्वीकृत या खर्च की दिशा में आगे बढ़ सकती थी।

फिलहाल उपलब्ध रिकॉर्ड में इस नए कार्य पर ₹0 व्यय दिखाई दे रहा है। 
इसलिए अब जरूरत है कि संबंधित अधिकारी धनराशि जारी होने से पहले ही पूरे मामले की जांच करें।

क्या पहले से बने अंत्येष्टि स्थल की तकनीकी जांच हुई है?

क्या पुराने कार्य की एमबी और भुगतान की जांच हुई?

क्या नए प्रस्ताव में उसी पुराने निर्माण की फोटो इस्तेमाल की गई?

क्या दोनों कार्यों का एस्टीमेट अलग-अलग है?

और सबसे महत्वपूर्ण—जब पुराना निर्माण मौजूद है तो उसी स्थान पर फिर 24.50 लाख रुपये का नया काम आखिर किस आधार पर प्रस्तावित किया गया?

जांच हुई तो खुल सकती है पूरी तस्वीर
इस मामले में सीधे तौर पर किसी को दोषी ठहराने के बजाय जरूरी है कि प्रशासन रिकॉर्ड और मौके की संयुक्त जांच कराए। 
पुराने कार्य की एमबी, एस्टीमेट, भुगतान वाउचर, पूर्णता प्रमाणपत्र और नए कार्य के प्रस्ताव की तकनीकी फाइल की जांच की जाए।

अगर जांच में सामने आता है कि एक ही निर्माण को अलग-अलग नाम या फोटो के जरिए दोबारा धनराशि लेने का प्रयास किया गया, तो यह बेहद गंभीर मामला होगा और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई के साथ सरकारी धन की सुरक्षा भी जरूरी होगी।

जनता से सीधा सवाल

19 लाख रुपये में बना मरघट, साल भर भी नहीं हुआ और दरारें सामने आ गईं। 
अब उसी मरघट की फोटो लगाकर फिर करीब 20 से 24.50 लाख रुपये का काम रिकॉर्ड में दिखाई दे रहा है, जबकि फिलहाल खर्च ₹0 दर्ज है।

आखिर एक ही मरघट पर बार-बार सरकारी धन क्यों?

अगर समय रहते यह मामला सामने नहीं आता तो क्या आने वाले दिनों में फिर लाखों रुपये उसी जगह खर्च हो जाते?

आपकी क्या राय है?
 क्या यह सिर्फ रिकॉर्ड की गलती है या इसके पीछे कोई बड़ा खेल हो सकता है? 
अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए।

कागजों में कुछ और, जमीन पर कुछ और—अब जांच बताएगी असली सच।

19 लाख का मरघट, साल भर भी नहीं टिका और उसी की फोटो लगाकर फिर 24.50 लाख का खेल? छिरिया सलेमपुर में सरकारी निर्माण पर बड़ा सवाल—पहले 19.43 लाख खर्च, अब उसी मरघट की फोटो लगाकर फिर लाखों की धनराशि का प्रस्ताव; रकम फिलहाल पेंडिंग जनपद जालौन के जालौन ब्लॉक क्षेत्र की ग्राम पंचायत छिरिया सलेमपुर में सरकारी धन से बनाए गए अंत्येष्टि स्थल की हालत और सरकारी रिकॉर्ड ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस मरघट के निर्माण पर करीब 19.43 लाख रुपये खर्च होना दर्ज है, उसमें निर्माण के कुछ ही समय बाद दरारें दिखाई दे रही हैं। सवाल यह है कि जब निर्माण अभी नया है और उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं, तो उसी मरघट की तस्वीर लगाकर दोबारा लगभग 20 से 24.50 लाख रुपये की धनराशि के लिए रिकॉर्ड क्यों तैयार किया गया? पहले 19.43 लाख खर्च, अब उसी जगह फिर लाखों का प्रस्ताव! मेरी पंचायत पर उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार छिरिया सलेमपुर ग्राम पंचायत में अंत्येष्टि स्थल से जुड़े निर्माण कार्य में 19,43,879 रुपये का व्यय दर्ज है, जबकि अनुमानित लागत 20 लाख रुपये दिखाई गई है। कार्य को पूर्ण भी दर्शाया गया है। लेकिन मौके पर निर्माण की स्थिति देखकर गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। लैंटर के नीचे की पट्टियों और निर्माण के कुछ हिस्सों में दरारें दिखाई दे रही हैं। यानी निर्माण पुराना होने की बात नहीं, बल्कि सवाल यह है कि साल भर भी पूरा नहीं हुआ और निर्माण में दरारें कैसे आ गईं? सबसे बड़ा सवाल—उसी मरघट की फोटो फिर क्यों? मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस मरघट का निर्माण पहले ही हो चुका है, उसी स्थान की फोटो लगाकर ग्राम पंचायत के ऑनलाइन रिकॉर्ड में फिर एक नए कार्य के लिए लगभग 20 से 24.50 लाख रुपये की अनुमानित धनराशि दिखाई गई है। उपलब्ध स्क्रीनशॉट में दूसरे कार्य की अनुमानित लागत 24,50,000 रुपये, पंजीकरण की तारीख 28 जुलाई 2026 और व्यय ₹0 दर्ज है। कार्य वर्तमान में चल रहा/प्रस्तावित स्थिति में दिखाई दे रहा है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल इस नए कार्य की धनराशि खर्च होना रिकॉर्ड में नहीं दिख रहा और रकम पेंडिंग स्थिति में है। यहीं से बड़ा सवाल पैदा होता है— जब उसी जगह पहले से करीब 19 लाख रुपये खर्च करके मरघट बनाया जा चुका है, तो फिर उसी मरघट की फोटो लगाकर दोबारा 20-24 लाख रुपये के नए कार्य का रिकॉर्ड क्यों तैयार किया गया? अगर समय रहते सवाल नहीं उठता तो...? आज अगर इस मामले पर सवाल नहीं उठाया जाता और रिकॉर्ड की पड़ताल नहीं की जाती, तो आशंका थी कि आने वाले दिनों में उसी स्थान पर दोबारा लाखों रुपये की धनराशि स्वीकृत या खर्च की दिशा में आगे बढ़ सकती थी। फिलहाल उपलब्ध रिकॉर्ड में इस नए कार्य पर ₹0 व्यय दिखाई दे रहा है। इसलिए अब जरूरत है कि संबंधित अधिकारी धनराशि जारी होने से पहले ही पूरे मामले की जांच करें। क्या पहले से बने अंत्येष्टि स्थल की तकनीकी जांच हुई है? क्या पुराने कार्य की एमबी और भुगतान की जांच हुई? क्या नए प्रस्ताव में उसी पुराने निर्माण की फोटो इस्तेमाल की गई? क्या दोनों कार्यों का एस्टीमेट अलग-अलग है? और सबसे महत्वपूर्ण—जब पुराना निर्माण मौजूद है तो उसी स्थान पर फिर 24.50 लाख रुपये का नया काम आखिर किस आधार पर प्रस्तावित किया गया? जांच हुई तो खुल सकती है पूरी तस्वीर इस मामले में सीधे तौर पर किसी को दोषी ठहराने के बजाय जरूरी है कि प्रशासन रिकॉर्ड और मौके की संयुक्त जांच कराए। पुराने कार्य की एमबी, एस्टीमेट, भुगतान वाउचर, पूर्णता प्रमाणपत्र और नए कार्य के प्रस्ताव की तकनीकी फाइल की जांच की जाए। अगर जांच में सामने आता है कि एक ही निर्माण को अलग-अलग नाम या फोटो के जरिए दोबारा धनराशि लेने का प्रयास किया गया, तो यह बेहद गंभीर मामला होगा और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई के साथ सरकारी धन की सुरक्षा भी जरूरी होगी। जनता से सीधा सवाल 19 लाख रुपये में बना मरघट, साल भर भी नहीं हुआ और दरारें सामने आ गईं। अब उसी मरघट की फोटो लगाकर फिर करीब 20 से 24.50 लाख रुपये का काम रिकॉर्ड में दिखाई दे रहा है, जबकि फिलहाल खर्च ₹0 दर्ज है। आखिर एक ही मरघट पर बार-बार सरकारी धन क्यों? अगर समय रहते यह मामला सामने नहीं आता तो क्या आने वाले दिनों में फिर लाखों रुपये उसी जगह खर्च हो जाते? आपकी क्या राय है? क्या यह सिर्फ रिकॉर्ड की गलती है या इसके पीछे कोई बड़ा खेल हो सकता है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। कागजों में कुछ और, जमीन पर कुछ और—अब जांच बताएगी असली सच।

Jalaun, Jalaun | Aug 11, 2026

उरई में डूडा विभाग का बड़ा खेल? ठेकेदारों से कथित सांठगांठ, शिकायतों पर भी नहीं होती कार्रवाई!

एक ही ठेकेदार को लगातार काम देने के आरोप, बिना मानक निर्माण से लोगों में भारी आक्रोश

उरई (जालौन)। उरई शहर में डूडा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि विभाग में विकास कार्यों के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है। उनका कहना है कि अधिकांश निर्माण कार्य कथित रूप से एक ही ठेकेदार को दिए जा रहे हैं और गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के बावजूद विभागीय अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय ठेकेदार का पक्ष लेते दिखाई देते हैं।

मोहल्लों के लोगों का आरोप है कि कई स्थानों पर सीसी सड़क, नाली और अन्य निर्माण कार्य निर्धारित मानकों की अनदेखी कर किए जा रहे हैं। शिकायत करने पर अधिकारी मौके का निरीक्षण तक नहीं करते और बिना जांच के ही कार्य को सही बता देते हैं। इससे लोगों में विभाग के प्रति नाराजगी लगातार बढ़ रही है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जहां-जहां डूडा विभाग के निर्माण कार्य चल रहे हैं, वहां के लोगों ने गुणवत्ता को लेकर कई बार आपत्ति दर्ज कराई है। इसके बावजूद न तो किसी निर्माण की तकनीकी जांच कराई गई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों ने शिकायतकर्ताओं की बात गंभीरता से सुनी।

लोगों ने जिला प्रशासन और शासन से मांग की है कि डूडा विभाग द्वारा कराए जा रहे सभी निर्माण कार्यों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए। यदि जांच में अनियमितता, मानकों की अनदेखी या किसी प्रकार की मिलीभगत सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि सरकारी धन का सही उपयोग सुनिश्चित हो सके।
जब इसकी शिकायत संबंधित अधिकारी  रतन प्रकाश यादव से की गई तो उन्होंने उनका जवाब यह रहा की पहले रोड डालते हैं उसके बाद नाली बनती है अब आप लोग समझ सकते हैं कि जब ऐसे अधिकारी ही ठेकेदारों की पक्ष में बात कर रहे हैं तो इस रोड को तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ना एक आम बात है।
अब देखना यह होगा की खबर प्रकाशित होने के बाद उच्च अधिकारी मामले को संज्ञान लेकर कार्रवाई करवाते हैं या ठेकेदारों की पक्ष लेकर इस रोड को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया जाता है।

उरई में डूडा विभाग का बड़ा खेल? ठेकेदारों से कथित सांठगांठ, शिकायतों पर भी नहीं होती कार्रवाई! एक ही ठेकेदार को लगातार काम देने के आरोप, बिना मानक निर्माण से लोगों में भारी आक्रोश उरई (जालौन)। उरई शहर में डूडा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि विभाग में विकास कार्यों के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है। उनका कहना है कि अधिकांश निर्माण कार्य कथित रूप से एक ही ठेकेदार को दिए जा रहे हैं और गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के बावजूद विभागीय अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय ठेकेदार का पक्ष लेते दिखाई देते हैं। मोहल्लों के लोगों का आरोप है कि कई स्थानों पर सीसी सड़क, नाली और अन्य निर्माण कार्य निर्धारित मानकों की अनदेखी कर किए जा रहे हैं। शिकायत करने पर अधिकारी मौके का निरीक्षण तक नहीं करते और बिना जांच के ही कार्य को सही बता देते हैं। इससे लोगों में विभाग के प्रति नाराजगी लगातार बढ़ रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जहां-जहां डूडा विभाग के निर्माण कार्य चल रहे हैं, वहां के लोगों ने गुणवत्ता को लेकर कई बार आपत्ति दर्ज कराई है। इसके बावजूद न तो किसी निर्माण की तकनीकी जांच कराई गई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों ने शिकायतकर्ताओं की बात गंभीरता से सुनी। लोगों ने जिला प्रशासन और शासन से मांग की है कि डूडा विभाग द्वारा कराए जा रहे सभी निर्माण कार्यों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए। यदि जांच में अनियमितता, मानकों की अनदेखी या किसी प्रकार की मिलीभगत सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि सरकारी धन का सही उपयोग सुनिश्चित हो सके। जब इसकी शिकायत संबंधित अधिकारी रतन प्रकाश यादव से की गई तो उन्होंने उनका जवाब यह रहा की पहले रोड डालते हैं उसके बाद नाली बनती है अब आप लोग समझ सकते हैं कि जब ऐसे अधिकारी ही ठेकेदारों की पक्ष में बात कर रहे हैं तो इस रोड को तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ना एक आम बात है। अब देखना यह होगा की खबर प्रकाशित होने के बाद उच्च अधिकारी मामले को संज्ञान लेकर कार्रवाई करवाते हैं या ठेकेदारों की पक्ष लेकर इस रोड को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया जाता है।

Jalaun, Jalaun | Aug 11, 2026

उरई में गूंजा वंदे मातरम्, पुलिस लाइन से निकली भव्य तिरंगा यात्रा

उरई, जालौन हर घर तिरंगा अभियान-2026 के तहत सोमवार को पुलिस लाइन उरई से भव्य तिरंगा यात्रा निकाली गई। 
यात्रा में विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राएं, शिक्षक, पुलिसकर्मी, जनप्रतिनिधि, अधिकारी और बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। 
करीब तीन किलोमीटर लंबी यात्रा के दौरान देशभक्ति के नारों से माहौल गूंजता रहा।

तिरंगा यात्रा पुलिस लाइन से निकलकर अंबेडकर चौराहे पहुंची, जहां उरई सदर विधायक, कालपी विधायक और जिला पंचायत अध्यक्ष घनश्याम ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। 
यात्रा में डीजे पर देशभक्ति गीत बजते रहे और लोग हाथों में तिरंगा लेकर पैदल चलते हुए ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाते रहे।

यात्रा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा। 
यात्रा के आगे-पीछे पुलिस बल तैनात रहा, जबकि आपात स्थिति के लिए एंबुलेंस भी साथ रही। 
पूरे आयोजन में राष्ट्रभक्ति और उत्साह का माहौल नजर आया।

उरई में गूंजा वंदे मातरम्, पुलिस लाइन से निकली भव्य तिरंगा यात्रा उरई, जालौन हर घर तिरंगा अभियान-2026 के तहत सोमवार को पुलिस लाइन उरई से भव्य तिरंगा यात्रा निकाली गई। यात्रा में विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राएं, शिक्षक, पुलिसकर्मी, जनप्रतिनिधि, अधिकारी और बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। करीब तीन किलोमीटर लंबी यात्रा के दौरान देशभक्ति के नारों से माहौल गूंजता रहा। तिरंगा यात्रा पुलिस लाइन से निकलकर अंबेडकर चौराहे पहुंची, जहां उरई सदर विधायक, कालपी विधायक और जिला पंचायत अध्यक्ष घनश्याम ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। यात्रा में डीजे पर देशभक्ति गीत बजते रहे और लोग हाथों में तिरंगा लेकर पैदल चलते हुए ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाते रहे। यात्रा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा। यात्रा के आगे-पीछे पुलिस बल तैनात रहा, जबकि आपात स्थिति के लिए एंबुलेंस भी साथ रही। पूरे आयोजन में राष्ट्रभक्ति और उत्साह का माहौल नजर आया।

Jalaun, Jalaun | Aug 10, 2026

गरीब की झोपड़ी पर कब पड़ेगी सरकार की नजर?

 आवास योजना के दावों के बीच 50 वर्षों से कच्चे मकान में जिंदगी काटने को मजबूर  भूमिहीन परिवार!

नदीगांव ब्लॉक के कुठौंदा गांव से गरीब परिवार की दर्दनाक दास्तान

 (जालौन)नदीगांव
सरकार की योजनाओं में गरीबों को पक्का आशियाना देने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। 
प्रधानमंत्री आवास योजना से लेकर तमाम सरकारी योजनाओं के जरिए जरूरतमंद परिवारों को छत उपलब्ध कराने की बात कही जाती है। 
लेकिन नदीगांव ब्लॉक क्षेत्र की ग्राम पंचायत कुठौंदा से सामने आई एक तस्वीर इन दावों पर कई सवाल खड़े कर रही है।

गांव की रहने वाली मुन्नी देवी पत्नी स्वर्गीय बाबूराम लुहार का परिवार आज भी कच्चे मकान में रहने को मजबूर बताया जा रहा है। 
परिवार के मुताबिक उनके चार बच्चे थे, जिनमें एक बच्चे की मृत्यु हो चुकी है, जबकि तीन बच्चे मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं।

बताया गया कि परिवार भूमिहीन भी है।
 ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब परिवार के पास अपनी जमीन तक नहीं है और आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर बताई जा रही है, तो आखिर उसे सरकारी आवास योजना का लाभ क्यों नहीं मिल सका?

 सबसे बड़ा सवाल—आखिर गरीब की सुनवाई क्यों नहीं?

क्या गरीब परिवार वास्तव में आवास योजना के मानकों में पात्र नहीं है?

अगर पात्र है तो अब तक आवास क्यों नहीं मिला?

क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने परिवार की वास्तविक स्थिति का सत्यापन किया?

क्या ग्राम पंचायत स्तर पर आवास के लिए परिवार का नाम पात्रता सूची में शामिल किया गया?

अगर नाम शामिल नहीं किया गया तो उसका कारण क्या है?

क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी ने इस परिवार के घर पहुंचकर उसकी स्थिति देखी?

सरकार गरीबों को पक्की छत देने की बात कर रही है, लेकिन अगर वास्तव में कोई भूमिहीन और जरूरतमंद परिवार आज भी कच्चे मकान में रहने को मजबूर है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंच रहा है या नहीं, इस सवाल से भी जुड़ा है।

 वीडियो को अंत तक जरूर देखिए और सुनिए मुन्नी देवी के परिवार की पूरी दास्तान।

आप भी वीडियो देखने के बाद अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।

 क्या आपके गांव में भी ऐसा कोई गरीब परिवार है, जिसे पात्र होने के बावजूद अभी तक आवास नहीं मिला?
कमेंट में गांव का नाम और समस्या जरूर बताइए।
 हमारी टीम मामले को सामने लाने का प्रयास करेगी।

हो सकता है आपकी एक आवाज किसी जरूरतमंद परिवार के सिर पर पक्की छत दिलाने की वजह बन जाए।

 अब सवाल सिर्फ आवास का नहीं, सरकारी योजनाओं के वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचने का है।

गरीब की झोपड़ी पर कब पड़ेगी सरकार की नजर? आवास योजना के दावों के बीच 50 वर्षों से कच्चे मकान में जिंदगी काटने को मजबूर भूमिहीन परिवार! नदीगांव ब्लॉक के कुठौंदा गांव से गरीब परिवार की दर्दनाक दास्तान (जालौन)नदीगांव सरकार की योजनाओं में गरीबों को पक्का आशियाना देने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना से लेकर तमाम सरकारी योजनाओं के जरिए जरूरतमंद परिवारों को छत उपलब्ध कराने की बात कही जाती है। लेकिन नदीगांव ब्लॉक क्षेत्र की ग्राम पंचायत कुठौंदा से सामने आई एक तस्वीर इन दावों पर कई सवाल खड़े कर रही है। गांव की रहने वाली मुन्नी देवी पत्नी स्वर्गीय बाबूराम लुहार का परिवार आज भी कच्चे मकान में रहने को मजबूर बताया जा रहा है। परिवार के मुताबिक उनके चार बच्चे थे, जिनमें एक बच्चे की मृत्यु हो चुकी है, जबकि तीन बच्चे मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। बताया गया कि परिवार भूमिहीन भी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब परिवार के पास अपनी जमीन तक नहीं है और आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर बताई जा रही है, तो आखिर उसे सरकारी आवास योजना का लाभ क्यों नहीं मिल सका? सबसे बड़ा सवाल—आखिर गरीब की सुनवाई क्यों नहीं? क्या गरीब परिवार वास्तव में आवास योजना के मानकों में पात्र नहीं है? अगर पात्र है तो अब तक आवास क्यों नहीं मिला? क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने परिवार की वास्तविक स्थिति का सत्यापन किया? क्या ग्राम पंचायत स्तर पर आवास के लिए परिवार का नाम पात्रता सूची में शामिल किया गया? अगर नाम शामिल नहीं किया गया तो उसका कारण क्या है? क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी ने इस परिवार के घर पहुंचकर उसकी स्थिति देखी? सरकार गरीबों को पक्की छत देने की बात कर रही है, लेकिन अगर वास्तव में कोई भूमिहीन और जरूरतमंद परिवार आज भी कच्चे मकान में रहने को मजबूर है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंच रहा है या नहीं, इस सवाल से भी जुड़ा है। वीडियो को अंत तक जरूर देखिए और सुनिए मुन्नी देवी के परिवार की पूरी दास्तान। आप भी वीडियो देखने के बाद अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें। क्या आपके गांव में भी ऐसा कोई गरीब परिवार है, जिसे पात्र होने के बावजूद अभी तक आवास नहीं मिला? कमेंट में गांव का नाम और समस्या जरूर बताइए। हमारी टीम मामले को सामने लाने का प्रयास करेगी। हो सकता है आपकी एक आवाज किसी जरूरतमंद परिवार के सिर पर पक्की छत दिलाने की वजह बन जाए। अब सवाल सिर्फ आवास का नहीं, सरकारी योजनाओं के वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचने का है।

Jalaun, Jalaun | Aug 10, 2026