छतरपुर SP कार्यालय में हंगामे के पीछे एक पीड़ित की न्याय की पुकार?
जानकारी के अनुसार, वीडियो में दिखाई दे रहा युवक लंबे समय से अपनी समस्या को लेकर प्रशासन के चक्कर काट रहा है। बताया जा रहा है कि वह एसपी, डीआईजी से लेकर मुख्यमंत्री तक को ज्ञापन दे चुका है, लेकिन अब तक उसे न्याय नहीं मिला है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब कोई व्यक्ति लगातार न्याय की गुहार लगाता रहे और उसकी सुनवाई न हो, तो उसकी पीड़ा और आक्रोश स्वाभाविक है।
यदि यह युवक हिंदू समाज से है, तो क्या समाज और विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे उसकी बात सुनें और न्याय दिलाने में सहयोग करें? समाज का दायित्व केवल हिंदू मुस्लिम वाले मुद्दों पर बयान देना नहीं, बल्कि हर पीड़ित व्यक्ति के साथ खड़ा होना भी है।
हालांकि, किसी भी मामले में निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी पक्षों की बात और प्रशासनिक तथ्य सामने आना जरूरी है। न्याय की मांग हर नागरिक का अधिकार है, चाहे वह किसी भी वर्ग, समुदाय या संगठन से जुड़ा हो।
क्या किसी भारत के किसी संविधान,नेता, सामाजिक कार्यकर्ता,संगठन में ताकत है की इस मामले की निष्पक्ष जांच करा सके।
और अगर एक पीड़ित को न्याय नहीं दिला सकते तो राम,सत्य, संविधान और न्याय के नाम पर ....बैठे है
आपकी क्या राय है? क्या पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए समाज और संगठनों को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए?