तेरी मेहरबानियां' का सजीव रूप: मालिक की मौत के सदमे में 'डुग्गू' ने भी त्यागे प्राण, बैतूल में एक साथ निकली दोनों की अंतिम यात्रा
आपने 80 के दशक की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'तेरी मेहरबानियां' तो जरूर देखी होगी, जिसमें एक वफादार कुत्ता अपने मालिक की मौत के बाद उसकी कब्र पर रो-रोकर दम तोड़ देता है। फिल्मी पर्दे की वह दर्दभरी दास्तां मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में हकीकत बनकर सामने आई है। यहाँ इंसान और बेजुबान के बीच अटूट प्रेम और वफादारी की एक ऐसी अनोखी मिसाल देखने को मिली, जिसने पूरे इलाके के लोगों की आँखें नम कर दीं।
अटूट था प्रदीप और 'डुग्गू' का रिश्ता
यह मर्मस्पर्शी घटना जिला मुख्यालय के गंज क्षेत्र की है। यहाँ के रहने वाले पान और चाय दुकान संचालक प्रदीप जैन का अपने पालतू डॉगी 'डुग्गू' से बेहद गहरा लगाव था। प्रदीप के लिए डुग्गू महज एक जानवर नहीं, बल्कि उनके परिवार का एक अभिन्न हिस्सा था। पिछले कुछ समय से प्रदीप जैन अस्वस्थ चल रहे थे और भोपाल के एक अस्पताल में उनका इलाज जारी था। अपने मालिक की अनुपस्थिति में डुग्गू भी घर पर गुमसुम और उदास रहने लगा था। आखिरकार, लंबी बीमारी के बाद रविवार को प्रदीप जैन का निधन हो गया।
अंतिम दर्शन के बाद डुग्गू ने भी तोड़ दिया दम
सोमवार को जब प्रदीप जैन का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए उनके गृह नगर बैतूल लाया गया, तो चारों तरफ मातम पसरा था। परिजनों ने अंतिम विदाई से पहले वफादार डुग्गू को उसके मालिक के अंतिम दर्शन कराए।
वह विदारक दृश्य देखकर हर किसी का कलेजा कांप उठा...
डुग्गू कुछ देर तक बेजान पड़े अपने मालिक के शरीर के पास खड़ा रहा, मानो वह उन्हें जगाने की कोशिश कर रहा हो। इसके बाद वह चुपचाप घर के एक कमरे में चला गया। कमरे में थोड़ी देर बेचैनी से चहल-कदमी करने के बाद, मालिक के बिछड़ने का गम वह सहन नहीं कर पाया और उसने भी हमेशा के लिए अपनी आँखें मूंद लीं।
एक साथ निकली दोनों की शव यात्रा
मालिक की मौत के तुरंत बाद वफादार डॉगी की मौत की खबर ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। परिजनों ने डुग्गू की इस निस्वार्थ वफादारी का सम्मान करने का फैसला किया। उन्होंने प्रदीप जैन और उनके प्यारे वफादार साथी डुग्गू की एक साथ शव यात्रा निकाली। जिस सम्मान के साथ प्रदीप जैन को विदा किया गया, उसी आदर और नम आँखों के साथ डुग्गू को भी अंतिम विदाई दी गई।
वफादारी की एक अमर मिसाल
फिल्म 'तेरी मेहरबानियां' में तो सब कुछ स्क्रीन प्ले के मुताबिक रचा गया था, लेकिन बैतूल की इस घटना ने साबित कर दिया कि बेजुबान जानवरों का प्यार इंसानी फरेब से कोसों दूर, बिल्कुल सच्चा और पवित्र होता है। प्रदीप और डुग्गू की यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम की कोई भाषा नहीं होती, इसे बस रूह से महसूस किया जा सकता है। दोनों भले ही इस दुनिया में न रहे हों, लेकिन उनकी यह अनोखी दास्तां हमेशा वफादारी की मिसाल बनकर जिंदा रहेगी।
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