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Dinesh Raj Prajapati

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<nis:link nis:type=tag nis:id=पिटाई nis:value=पिटाई nis:enabled=true nis:link/> के <nis:link nis:type=tag nis:id=आरोपियों nis:value=आरोपियों nis:enabled=true nis:link/> का पुलिस ने <nis:link nis:type=tag nis:id=निकाला nis:value=निकाला nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=जुलूस: nis:value=जुलूस: nis:enabled=true nis:link/> "अपराध करना पाप है, पुलिस हमारी बाप है" के नारे लगवाए

<nis:link nis:type=tag nis:id=पिपरई nis:value=पिपरई nis:enabled=true nis:link/> चिकमंगलूर चौराहे पर ट्रक ड्राइवर दिलीप यादव के साथ मारपीट करने वाले आरोपियों को पुलिस ने ऐसा सबक सिखाया कि पूरा बाजार देखने निकला। पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर उनका जुलूस निकाला और उनसे "अपराध करना पाप है, पुलिस हमारी बाप है" के नारे लगवाए।
SP Ashoknagar - M.P.
पिपरई में युवक के साथ मारपीट का वीडियो वायरल
SP Ashoknagar - M.P. Home Department of Madhya Pradesh @highlight
पिपरई में युवक के साथ मारपीट का वीडियो वायरल
SP Ashoknagar - M.P.
# धरोहर की ओट में सिसकती नैतिकता: चंदेरी का आबकारी सच
**- व्यवस्था की चौखट पर दम तोड़ते नियम और छले जाते नौनिहाल**
चंदेरी सिर्फ पत्थरों, किलों और साड़ियों का शहर नहीं है; यह एक जीवंत तहज़ीब, एक बेदाग इतिहास और सामाजिक समरसता की साक्षात प्रतिमूर्ति रहा है। किंतु आज इस ऐतिहासिक नगरी की हवाओं में एक अजीब सी कड़वाहट और अश्लीलता घोल दी गई है। नगर के हृदयस्थल पर पसरा शराब का साम्राज्य और उसके इर्द-गिर्द पनपती अराजकता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब प्रशासनिक तंत्र जनहित से विमुख होकर सत्ता और रसूख के आगे नतमस्तक हो जाता है, तो विनाश की पटकथा कैसे लिखी जाती है।
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> नियमों की अर्थी पर सजा 'मधुशाला' का बाज़ार
मध्य प्रदेश आबकारी नीति 1995 और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समय-समय पर आए दिशा-निर्देश कोई बंद कमरों में लिखी गई कविताएं नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ पढ़ा जाए। वे कानून हैं। लेकिन चंदेरी की भौगोलिक और प्रशासनिक हकीकत को देखें तो स्पष्ट होता है कि यहाँ इन नियमों की सरेआम अर्थी निकाली जा रही है।
एक शराब की दुकान का नगर के बीचो-बीच और दरगाह जैसी मुकद्दस जगह के पास होना, और दूसरी दुकान का शासकीय प्राथमिक विद्यालय हरकुण्ड की दहलीज से सटकर संचालित होना, प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
> **सोचिए, हम अपने बच्चों को कैसा भविष्य सौंप रहे हैं?** जिस उम्र में बच्चों के हाथों में ज्ञान की वर्णमाला होनी चाहिए, उस उम्र में वे अपनी पाठशाला के ठीक बाहर शराबियों की गालियां, असंसदीय भाषा और मदहोशी का नंगा नाच देखने को मजबूर हैं। क्या यह उन मासूमों के मौलिक और नैतिक अधिकारों का हनन नहीं है?
> 
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> समानांतर सत्ता चलाते शराब ठेकेदार और मौन प्रशासन
इस पूरे प्रकरण में जो सबसे वीभत्स पहलू है, वह है शराब माफियाओं के बुलंद हौसले। कागजों पर केवल दो दुकानें स्वीकृत हैं, लेकिन व्यवहार में चंदेरी के गांव-गांव में अवैध कलारियों का एक पूरा संजाल (नेटवर्क) बिछा दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि चंदेरी में आबकारी विभाग का समानांतर शासन चल रहा है, जहाँ नियम ठेकेदार तय करते हैं और अमला सिर्फ तामील करता है।
नगर पालिका परिषद चंदेरी द्वारा इन दुकानों को शहर के बाहर स्थापित करने के लिए बाकायदा 'ठहराव संकल्प' पारित किया जा चुका है। पार्षदों द्वारा ग्वालियर आबकारी आयुक्त को लगातार पत्र लिखे जा रहे हैं। बावजूद इसके, अधिकारियों की यह रहस्यमयी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
 * क्या प्रशासन जनभावनाओं से ऊपर किसी अदृश्य दबाव में काम कर रहा है?
 * या फिर यह पूरी खामोशी किसी 'महीने की सेटिंग' और 'प्रशासनिक साठगांठ' के एवज में खरीदी गई है?
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> बिखरते आशियाने और सुलगता जन-आक्रोश
शराब की इन दुकानों ने केवल सड़कों का माहौल खराब नहीं किया है, बल्कि इसने चंदेरी के सैकड़ों घरों के भीतर गृहक्लेश, घरेलू हिंसा और आर्थिक तबाही का ज़हर घोल दिया है। ग्रामीण अंचलों में आए दिन होने वाले वाद-विवाद और अपराधों के मूल में यही अवैध शराब का कारोबार है।
जनता यह सब देख रही है, सह रही है, लेकिन याद रहे कि लोक-लाज और सब्र की एक अंतिम सीमा होती है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में मौन सहमति देने लगे, तो फिर जनता को सड़कों पर उतरने से कोई नहीं रोक सकता।
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> उपसंहार: जागने का अंतिम अवसर
चंदेरी की अस्मिता, संस्कृति और यहाँ के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की रक्षा के लिए अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। ग्वालियर संभाग के आबकारी आयुक्त और स्थानीय जिला प्रशासन को तत्काल प्रभाव से इस विषय को संज्ञान में लेना होगा। इन दोनों दुकानों को अविलंब नगर की सीमा से बाहर स्थानांतरित किया जाए और ग्रामीण क्षेत्रों में चल रही अवैध मधुशालाओं पर कानून का हंटर चलाया जाए।
यदि अब भी प्रशासनिक कुंभकर्णी नींद नहीं टूटी, तो यह मान लिया जाएगा कि शासन को जनता की चीखों से ज्यादा शराब के राजस्व और ठेकेदारों के मुनाफे की फिक्र है। किसी बड़े हादसे या उग्र जन-आंदोलन की प्रतीक्षा करने के बजाय, समय रहते जनहित में निर्णय लेना ही प्रशासनिक बुद्धिमत्ता होगी।
Gwalior Commissioner Jansampark Madhya Pradesh Collector Ashok Nagar SDM Chanderi PRO Ashok Nagar @highlight
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहुंचे दतिया मां पीतांबरा मंदिर पर पहुंचकर किए दर्शन
@highlight
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के खनियाधाना ग्राम गुड़र गांव में सिलेंडर फटने से मकान में लगी आग दीवाल गिरने से 13 14 साल की बच्ची की मौत होना बताया जा रहा है।  प्रजापति समाज का घर बताया जा रहा है फिलहाल प्रशासन को तत्काल सूचना मिलते ही मौके पर फायर ब्रिगेड गाड़ी मौके पर पहुच गई है। और आग पर काबू किया ज रहा है मामले की जांच चल रही है खनियाधाना थाने के अंतर्गत गूडर गांव
खाकी पर भारी पड़ता घरेलू विवाद: जब रक्षक ही बन जाएं हिंसा का शिकार

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई (ग्राम कामथ) से सामने आई घटना केवल एक वायरल वीडियो या पुलिस और जनता के बीच की झड़प मात्र नहीं है। यह घटना हमारे सामाजिक ताने-बाने, कानून के प्रति घटते सम्मान और पुलिस बल की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर आत्मचिंतन की मांग करती है। एक महिला की सुरक्षा के लिए, उसके बुलावे पर आधी रात या किसी भी वक्त दौड़कर पहुँचने वाली 'डायल-112' की टीम को जब खुद अपनी सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़े, तो समाज के तौर पर हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है।
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> घरेलू चौखट से सड़क तक आता आक्रोश
इस घटना की शुरुआत एक आम घरेलू विवाद से हुई—एक ऐसा विवाद जो अमूमन बंद कमरों में सुलझ जाना चाहिए था। लेकिन जब बात हद से बढ़ी, तो पीड़ित महिला ने न्याय और सुरक्षा की उम्मीद में पुलिस को पुकारा।
विडंबना देखिए कि जो पुलिस टीम (आरक्षक सत्येंद्र पाल और उनके साथी) अपनी जान जोखिम में डालकर दो पक्षों के बीच बीच-बचाव करने पहुँची थी, वही हिंसक भीड़ के निशाने पर आ गई। पहली बार में विवाद शांत न होने पर जब पुलिस दोबारा स्थिति को संभालने पहुँची, तो उन पर पथराव किया गया और आरक्षक के साथ सरेआम धक्का-मुक्की और मारपीट की गई।
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> कानून के खौफ का खत्म होना: एक चिंताजनक संकेत
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो (भले ही इसकी तकनीकी पुष्टि बाकी हो) एक बेहद कड़वी हकीकत बयां करता है। वर्दी पहने एक सरकारी कर्मचारी, जो उस वक्त 'राज्य' और 'कानून' का प्रतिनिधित्व कर रहा है, उसके साथ ऐसी बदसलूकी दर्शाती है कि कुछ लोगों के भीतर से कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है।
> जब समाज का एक हिस्सा कानून के रखवालों पर ही हाथ उठाने को अपनी बहादुरी समझने लगे, तो वह अराजकता की शुरुआत होती है। पुलिस पर हमला दरअसल उस व्यवस्था पर हमला है जो हमें और आपको सुरक्षित रखती है।
> 
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> रक्षकों की सुरक्षा का सवाल
अक्सर पुलिस की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठती हैं, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि 'डायल-100' या 'डायल-112' पर तैनात जवान हर दिन किस मानसिक और शारीरिक तनाव के बीच काम करते हैं। वे नहीं जानते कि जिस कॉल पर वे जा रहे हैं, वहाँ उनका सामना किस तरह की उग्र भीड़ से होने वाला है। बिना किसी ठोस सुरक्षा घेरे के, महज दो या तीन पुलिसकर्मी एक हिंसक भीड़ के बीच पहुँच जाते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम और त्वरित बैकअप की व्यवस्था पर भी विचार होना चाहिए।
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> निष्कर्ष: सख्त कार्रवाई ही एकमात्र समाधान
इस मामले में पुलिस ने शिकायत के बाद प्रकरण दर्ज कर लिया है, लेकिन बात सिर्फ एक मुकदमे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। खाकी पर हाथ उठाने वाले, पथराव करने वाले और सरकारी काम में बाधा डालने वाले तत्वों को यह संदेश मिलना जरूरी है कि कानून लचीला हो सकता है, लेकिन कमजोर नहीं।
अगर आज हम अपने रक्षकों के साथ खड़ी इस हिंसक भीड़ को मूकदर्शक बनकर देखते रहे, तो कल किसी भी आम नागरिक की सुरक्षा भगवान भरोसे ही होगी। वक्त आ गया है कि ऐसी घटनाओं पर न केवल सख्त कानूनी चोट की जाए, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी वर्दी का सम्मान बहाल किया जाए।

CM Madhya Pradesh Dr Mohan Yadav Jansampark Madhya Pradesh
Home Department of Madhya Pradesh
अशोकनगर में पटवारियों के 'थोकबंद तबादले' और अब 'घर वापसी': प्रशासनिक सुधारात्मक कदम या महज एक सियासी चक्रव्यूह?
अशोकनगर जिले के प्रशासनिक गलियारों से लेकर चाय की थड़ियों तक, इन दिनों एक ही मुद्दा सबसे गर्माया हुआ है—पटवारियों और प्रशासनिक कर्मचारियों के तबादले, निलंबन (सस्पेंशन) और अब चुपके से हो रही उनकी 'घर वापसी'।
पिछले कुछ महीनों पहले, तत्कालीन कलेक्टर आदित्य सिंह ने जिले की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक कसावट को दुरुस्त करने के उद्देश्य से एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया था। उन्होंने सालों से एक ही तहसील या हल्के में अंगद की तरह पैर जमाए बैठे पटवारियों और अन्य कर्मचारियों के थोकबंद तबादले एक झटके में दूसरी तहसीलों में कर दिए थे। इनमें से कई कर्मचारी तो ऐसे थे, जो अपनी पूरी नौकरी एक ही जगह काट चुके थे और रिटायरमेंट के मुहाने पर खड़े थे।
लेकिन अब, जब हालात धीरे-धीरे बदलने लगे हैं और उन्हीं चेहरों की वापस पुराने ढर्रे पर बहाली या वापसी हो रही है, तो जनता और राजनीतिक हलकों में एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है। आखिर तब क्या परिस्थितियां थीं और अब ऐसा क्या बदल गया?
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> 1. तब क्या थीं परिस्थितियां? क्यों उठाने पड़े थे कड़े कदम?
तत्कालीन कलेक्टर आदित्य सिंह के कार्यकाल के दौरान जब यह सामूहिक फेरबदल और सस्पेंशन की कार्रवाई हुई, तो उसके पीछे कुछ बेहद स्पष्ट प्रशासनिक कारण बताए गए थे:
 * **नेक्सस (गठजोड़) को तोड़ना:** जो कर्मचारी या पटवारी सालों से एक ही जगह जमे हुए थे, उनका स्थानीय स्तर पर एक मजबूत नेटवर्क बन चुका था। इससे भ्रष्टाचार, गुटबाजी और आम जनता के कामों में लापरवाही की शिकायतें लगातार बढ़ रही थीं।
 * **प्रशासनिक कसावट और कानून व्यवस्था:** जमीनी स्तर पर शासकीय योजनाओं का लाभ पारदर्शी तरीके से पहुंचाने और भू-माफियाओं या स्थानीय रसूखदारों के साथ कर्मचारियों के गठजोड़ को खत्म करने के लिए यह सर्जरी जरूरी मानी गई थी।
 * **सस्पेंशन की गाज:** काम में लापरवाही बरतने, मुख्यालय पर न रहने या अनुशासनहीनता दिखाने वाले कई कर्मचारियों को सस्पेंड भी किया गया था, ताकि पूरे अमले में एक कड़ा संदेश जाए कि 'काम नहीं तो रियायत नहीं'।
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> 2. अब क्या बन रहे हैं हालात? क्यों हो रही है 'घर वापसी'?
जैसे ही प्रशासनिक मुखिया बदला या समय बीता, परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। जिन पटवारियों को "कानून व्यवस्था और सुधार" के नाम पर दूर भेजा गया था, उनकी धीरे-धीरे अपने पुराने या मनपसंद क्षेत्रों में वापसी होने लगी है। इस 'यू-टर्न' के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित वजहें मानी जा रही हैं:
 * **क्या स्थानीय राजनेताओं और रसूखदारों का दबाव:** सालों से एक ही जगह जमे कर्मचारियों के संबंध केवल जनता से नहीं, बल्कि स्थानीय रसूखदारों और नेताओं से भी गहरे होते हैं। जिसके चलते आखिरकार प्रशासन को झुकना पड़ा।
 * **सिस्टम को 'मैनेज' करने का खेल:** प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी आम है कि इस पूरी घर वापसी के पीछे एक बड़ा "मैनेजमेंट" (लेन-देन या प्रभाव) काम कर रहा है। जो कड़े नियम पहले बताए गए थे, वे अब ठंडे बस्ते में डाल दिए गए हैं।
 * **प्रशासनिक शिथिलता:** नए प्रशासनिक नेतृत्व के आने या प्राथमिकताओं के बदलने से पुराने फैसलों की समीक्षा की गई और "मानवीय दृष्टिकोण" या "काम प्रभावित होने" का हवाला देकर बहाली का रास्ता साफ कर दिया गया।
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> 3. अशोकनगर की जनता के मन में उठते बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने जिले की जनता और जागरूक नागरिकों के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। लोग अब खुलकर प्रशासन की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं:
> **बड़ा सवाल:** अगर उस समय तबादले और सस्पेंशन कानून व्यवस्था सुधारने और सही प्रशासनिक व्यवस्था के लिए किए गए थे, तो क्या अब व्यवस्था इतनी सुधर गई है कि उन दागी या जमे हुए चेहरों को वापस लाया जा रहा है? या फिर उस समय की कार्रवाई सिर्फ एक दिखावा या पब्लिसिटी स्टंट थी?
> 
यदि कर्मचारी सालों से एक ही जगह रहकर सिस्टम को दूषित कर रहे थे, तो अब उनकी घर वापसी से क्या दोबारा वही भ्रष्टाचार और लापरवाही का माहौल नहीं बनेगा?
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> निष्कर्ष: साख पर उठता सवाल
अशोकनगर जिले का यह पूरा पटवारी और कर्मचारी विवाद यह साफ करता है कि प्रशासनिक सुधार के बड़े-बड़े दावे अक्सर व्यवस्था के 'शॉर्टकट' और 'दबाव' के आगे दम तोड़ देते हैं। तत्कालीन कलेक्टर आदित्य सिंह ने जिस प्रशासनिक सर्जरी के जरिए जिले की व्यवस्था को सुधारने की कोशिश की थी, वर्तमान में हो रही उनकी बहाली और वापसी ने उस पूरी मेहनत और साख पर पानी फेर दिया है।
अब देखना यह होगा कि इस 'घर वापसी' के बाद जिले की कानून व्यवस्था और राजस्व मामलों में क्या बदलाव आता है, या फिर अशोकनगर का आम नागरिक इसी तरह फाइलों के चक्कर काटता रहेगा और 'अंगद' अपनी जगह पर दोबारा मजबूत होते रहेंगे।
Jansampark Madhya Pradesh Gwalior Commissioner Collector Ashok Nagar PRO Ashok Nagar
अशोकनगर शर्मसार: बस हाउसफुल होने पर दबंगों का कहर, दफ्तर से घसीटकर क्लीनर को लात-घूंसों से पीटा; रोंगटे खड़े कर देगा CCTV वीडियो!
Home Department of Madhya Pradesh SP Ashoknagar - M.P. 
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कॉकरोच जनता पार्टी के जयपुर प्रदर्शन के दौरान चीफ अभिजीत दीपके के साथ हाथापाई ।

जब विचारों से लड़ना मुमकिन न हो, तो हाथा पाई मार धाड़ ही इनका विकल्प है । सरकार इन्ही की है और प्यादे भी ।
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अशोकनगर में पटवारियों के 'थोकबंद तबादले' और अब 'घर वापसी': प्रशासनिक सुधारात्मक कदम या महज एक सियासी चक्रव्यूह?
अशोकनगर जिले के प्रशासनिक गलियारों से लेकर चाय की थड़ियों तक, इन दिनों एक ही मुद्दा सबसे गर्माया हुआ है—पटवारियों और प्रशासनिक कर्मचारियों के तबादले, निलंबन (सस्पेंशन) और अब चुपके से हो रही उनकी 'घर वापसी'।
पिछले कुछ महीनों पहले, तत्कालीन कलेक्टर आदित्य सिंह ने जिले की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक कसावट को दुरुस्त करने के उद्देश्य से एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया था। उन्होंने सालों से एक ही तहसील या हल्के में अंगद की तरह पैर जमाए बैठे पटवारियों और अन्य कर्मचारियों के थोकबंद तबादले एक झटके में दूसरी तहसीलों में कर दिए थे। इनमें से कई कर्मचारी तो ऐसे थे, जो अपनी पूरी नौकरी एक ही जगह काट चुके थे और रिटायरमेंट के मुहाने पर खड़े थे।
लेकिन अब, जब हालात धीरे-धीरे बदलने लगे हैं और उन्हीं चेहरों की वापस पुराने ढर्रे पर बहाली या वापसी हो रही है, तो जनता और राजनीतिक हलकों में एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है। आखिर तब क्या परिस्थितियां थीं और अब ऐसा क्या बदल गया?
<nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> 1. तब क्या थीं परिस्थितियां? क्यों उठाने पड़े थे कड़े कदम?
तत्कालीन कलेक्टर आदित्य सिंह के कार्यकाल के दौरान जब यह सामूहिक फेरबदल और सस्पेंशन की कार्रवाई हुई, तो उसके पीछे कुछ बेहद स्पष्ट प्रशासनिक कारण बताए गए थे:
 * **नेक्सस (गठजोड़) को तोड़ना:** जो कर्मचारी या पटवारी सालों से एक ही जगह जमे हुए थे, उनका स्थानीय स्तर पर एक मजबूत नेटवर्क बन चुका था। इससे भ्रष्टाचार, गुटबाजी और आम जनता के कामों में लापरवाही की शिकायतें लगातार बढ़ रही थीं।
 * **प्रशासनिक कसावट और कानून व्यवस्था:** जमीनी स्तर पर शासकीय योजनाओं का लाभ पारदर्शी तरीके से पहुंचाने और भू-माफियाओं या स्थानीय रसूखदारों के साथ कर्मचारियों के गठजोड़ को खत्म करने के लिए यह सर्जरी जरूरी मानी गई थी।
 * **सस्पेंशन की गाज:** काम में लापरवाही बरतने, मुख्यालय पर न रहने या अनुशासनहीनता दिखाने वाले कई कर्मचारियों को सस्पेंड भी किया गया था, ताकि पूरे अमले में एक कड़ा संदेश जाए कि 'काम नहीं तो रियायत नहीं'।
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जैसे ही प्रशासनिक मुखिया बदला या समय बीता, परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। जिन पटवारियों को "कानून व्यवस्था और सुधार" के नाम पर दूर भेजा गया था, उनकी धीरे-धीरे अपने पुराने या मनपसंद क्षेत्रों में वापसी होने लगी है। इस 'यू-टर्न' के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित वजहें मानी जा रही हैं:
 * **क्या स्थानीय राजनेताओं और रसूखदारों का दबाव:** सालों से एक ही जगह जमे कर्मचारियों के संबंध केवल जनता से नहीं, बल्कि स्थानीय रसूखदारों और नेताओं से भी गहरे होते हैं। जिसके चलते आखिरकार प्रशासन को झुकना पड़ा।
 * **सिस्टम को 'मैनेज' करने का खेल:** प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी आम है कि इस पूरी घर वापसी के पीछे एक बड़ा "मैनेजमेंट" (लेन-देन या प्रभाव) काम कर रहा है। जो कड़े नियम पहले बताए गए थे, वे अब ठंडे बस्ते में डाल दिए गए हैं।
 * **प्रशासनिक शिथिलता:** नए प्रशासनिक नेतृत्व के आने या प्राथमिकताओं के बदलने से पुराने फैसलों की समीक्षा की गई और "मानवीय दृष्टिकोण" या "काम प्रभावित होने" का हवाला देकर बहाली का रास्ता साफ कर दिया गया।
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इस पूरे घटनाक्रम ने जिले की जनता और जागरूक नागरिकों के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। लोग अब खुलकर प्रशासन की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं:
> **बड़ा सवाल:** अगर उस समय तबादले और सस्पेंशन कानून व्यवस्था सुधारने और सही प्रशासनिक व्यवस्था के लिए किए गए थे, तो क्या अब व्यवस्था इतनी सुधर गई है कि उन दागी या जमे हुए चेहरों को वापस लाया जा रहा है? या फिर उस समय की कार्रवाई सिर्फ एक दिखावा या पब्लिसिटी स्टंट थी?
> 
यदि कर्मचारी सालों से एक ही जगह रहकर सिस्टम को दूषित कर रहे थे, तो अब उनकी घर वापसी से क्या दोबारा वही भ्रष्टाचार और लापरवाही का माहौल नहीं बनेगा?
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अशोकनगर जिले का यह पूरा पटवारी और कर्मचारी विवाद यह साफ करता है कि प्रशासनिक सुधार के बड़े-बड़े दावे अक्सर व्यवस्था के 'शॉर्टकट' और 'दबाव' के आगे दम तोड़ देते हैं। तत्कालीन कलेक्टर आदित्य सिंह ने जिस प्रशासनिक सर्जरी के जरिए जिले की व्यवस्था को सुधारने की कोशिश की थी, वर्तमान में हो रही उनकी बहाली और वापसी ने उस पूरी मेहनत और साख पर पानी फेर दिया है।
अब देखना यह होगा कि इस 'घर वापसी' के बाद जिले की कानून व्यवस्था और राजस्व मामलों में क्या बदलाव आता है, या फिर अशोकनगर का आम नागरिक इसी तरह फाइलों के चक्कर काटता रहेगा और 'अंगद' अपनी जगह पर दोबारा मजबूत होते रहेंगे।
Jansampark Madhya Pradesh Gwalior Commissioner Collector Ashok Nagar PRO Ashok Nagar
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अशोकनगर-- देहात थाना क्षेत्र के हैदर गांव की नदी में मिला 19 वर्षीय युवक का शव, चेहरे पर चोट के निशान; परिजनों ने जताया हत्या का अंदेशा
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Collector Ashok Nagar Gwalior Commissioner SDM Chanderi PRO Ashok Nagar @highlight
नियम कायदों की अर्थी और 'शराब तंत्र' के आगे लाचार चंदेरी का प्रशासन

​शासन-प्रशासन की रीढ़ तब कमजोर होने लगती है, जब कानून की किताबें दफ्तरों की अलमारियों में बंद हो जाती हैं और सड़कों पर माफियाओं का 'समानांतर सिस्टम' चलने लगता है। चंदेरी की पुरानी सब्जी मंडी के पास स्थित कलारी नंबर एक (राजेंद्र कुमार राय) के नाम से जो वीडियो सामने आया है, वह केवल एक शराब दुकान की मनमानी नहीं है, बल्कि चंदेरी के समूचे प्रशासनिक तंत्र की लाचारी और नाकामी का जीता-जागता दस्तावेज है।
​यह लेख किसी घटना की सूचना मात्र नहीं है, बल्कि उस सोए हुए सिस्टम के जमीर को झकझोरने का प्रयास है, जो रसूखदारों के आगे नतमस्तक हो चुका है।
​डिजिटल युग में 'अवैधता' का आधुनिक चेहरा
​वीडियो में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह हैरान करने वाला भी है और शर्मनाक भी। दुकान बाहर से बंद है—यह दिखाने के लिए कि कानून का पालन हो रहा है। लेकिन जैसे ही कोई ग्राहक आवाज लगाता है, शटर के नीचे से एक 'क्यूआर कोड स्कैनर' बाहर आता है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में तकनीक का ऐसा दुरुपयोग शायद ही कहीं देखने को मिले। ऑनलाइन भुगतान होते ही शराब की बोतलें बाहर आ जाती हैं।
​यह चालाकी साबित करती है कि दुकान संचालक को इस बात का पूरा अहसास है कि वह जो कर रहा है, वह अवैध है। लेकिन उसे यह भी पता है कि प्रशासन की आंखें कितनी गहरी नींद में हैं। जब आबकारी और पुलिस विभाग की नाक के नीचे 24 घंटे कलारी खुल रही हो, तो जनता यह मानने पर मजबूर हो जाती है कि यह खेल बिना 'ऊपरी सह' के मुमकिन नहीं है। सारे नियम-कायदे इस कलारी संचालक ने खूंटी पर टांग दिए हैं और व्यवस्था मूकदर्शक बनी बैठी है।
​नौनिहालों के भविष्य पर 'मधुशाला' का साया
​इस पूरे घालमेल का सबसे विचलित करने वाला पहलू इसका भूगोल है। इस कलारी से महज 100-200 मीटर की दूरी पर हायर सेकेंडरी स्कूल स्थित है। एक तरफ सरकारें 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और 'स्वस्थ बचपन' के नारे देती हैं, वहीं दूसरी तरफ स्कूल की चौखट के पास चौबीसों घंटे शराब का यह तमाशा चल रहा है।
​जब बच्चे स्कूल पढ़ने जाएंगे, तो उनके स्वागत के लिए ज्ञान की बातें नहीं, बल्कि इस कलारी के बाहर लगने वाला शराबियों का मजमा होगा। प्रशासन ने बिना सोचे-समझे इस संवेदनशील इलाके में कलारी की परमिशन कैसे दे दी? क्या अधिकारियों को यह समझ नहीं आता कि इस माहौल का बच्चों के कोमल दिमाग पर क्या असर पड़ेगा? क्या चंद रुपयों के राजस्व या रसूख के सामने हमारे बच्चों का भविष्य इतना सस्ता हो गया है?
​कब टूटेगी प्रशासन की यह रहस्यमयी खामोशी?
​यह स्थिति प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
​आखिर सिस्टम इन कलारी संचालकों के आगे इतना बेबस क्यों दिखाई दे रहा है?
​क्या चंदेरी का आबकारी और पुलिस महकमा इतना कमजोर हो चुका है कि वह समय सीमा के बाद बंद शटर के पीछे चल रहे इस खेल को नहीं देख पा रहा?
​क्या किसी बड़ी दुर्घटना या जन-आक्रोश के फूटने के बाद ही अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेंगे?
​एक कड़वी सच्चाई: जब रसूखदार कानून को अपनी जेब में लेकर घूमने लगें और रक्षक ही मौन साध लें, तो समाज में अराजकता का जन्म होता है। चंदेरी में यही हो रहा है।
​निष्कर्ष: अब आर-पार की लड़ाई जरूरी है
​चंदेरी की जनता अब इस लाचार और घुटने टेक चुके सिस्टम को और बर्दाश्त नहीं करेगी। यह लेख प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है और आईना भी। यदि समय रहते इस 24 घंटे चलने वाली कलारी पर लगाम नहीं कसी गई, और इसे स्कूल के पास से स्थानांतरित नहीं किया गया, तो यह मान लिया जाएगा कि चंदेरी में कानून का राज नहीं, बल्कि 'शराब तंत्र' का राज चलता है।
​अब देखना यह है कि इस कड़वे सच के सामने आने के बाद जिम्मेदार अधिकारी अपनी साख बचाने के लिए कोई ठोस कार्रवाई करते हैं, या फिर हमेशा की तरह अपनी आंखें मूंदकर किसी बड़े बवाल का इंतजार करते हैं।
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