संज्ञान : CM Madhya Pradesh
# 🔥 जल विहार मेला या नेताओं की कमाई का बाजार? गरीबों की जेब पर महंगाई का हथौड़ा!
**छतरपुर में जल विहार मेले की दुकानों के आवंटन पर गंभीर सवाल, ₹3 हजार की दुकान के लिए ₹30–40 हजार वसूले जाने के आरोप! आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह खेल?**
छतरपुर। जिस जल विहार मेले का इंतजार गरीब, मजदूर और किसान परिवार साल भर करते थे, क्या आज वही मेला कुछ रसूखदारों की कमाई का जरिया बनता जा रहा है? जिस मेले में कभी आम आदमी अपने परिवार के साथ घूमने, बच्चों के लिए खिलौने खरीदने और जरूरत का सामान सस्ते में लेने आता था, आज उसी मेले में उसकी जेब पर महंगाई का ऐसा बोझ पड़ने की आशंका है कि मेले में जाने से पहले भी उसे अपनी जेब टटोलनी पड़े!
**आरोप है कि नगर पालिका से करीब ₹3 हजार में मिलने वाली दुकान के लिए व्यापारियों से ₹30 हजार से ₹40 हजार, यहां तक कि ₹40–50 हजार तक देने का दबाव बनाया जा रहा है।** यदि ये आरोप सही हैं, तो सवाल सिर्फ दुकानों के आवंटन का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें गरीब की खुशियों के मेले पर रसूखदारों की कथित मनमानी भारी पड़ती दिखाई दे रही है।
## दुकानों पर किसका अधिकार? नगर पालिका का या नेताओं की कथित हुकूमत का?
व्यापारियों का आरोप है कि कुछ भाजपा पार्षदों और नेताओं से जुड़े लोग दुकानों पर अपना दावा जताते हैं। कथित तौर पर व्यापारियों को फोन करके कहा जाता है कि संबंधित दुकान उनकी है और वहां कोई दूसरा कब्जा नहीं कर सकता।
अब सवाल यह है कि अगर दुकान नगर पालिका की है, तो उसका आवंटन नियमों के अनुसार होगा या फिर किसी की राजनीतिक पहुंच के दम पर? अगर कोई व्यापारी निर्धारित शुल्क देकर दुकान लेना चाहता है, तो उसे कथित दबाव और मनमानी का सामना क्यों करना पड़े?
**नगर पालिका की दुकान पर अगर नियमों से ज्यादा रसूख चलता है, तो फिर सरकारी व्यवस्था और निजी हुकूमत में फर्क ही क्या रह जाता है?**
## ₹3 हजार की दुकान ₹40 हजार में पड़ेगी, तो नुकसान किसका होगा?
व्यापारी कोई समाजसेवा करने नहीं, कारोबार करने मेले में आता है। वह दुकान के लिए हजारों रुपये अतिरिक्त खर्च करेगा, माल खरीदेगा, कर्मचारियों और परिवहन पर पैसा लगाएगा। अब वह इस कथित अतिरिक्त खर्च की भरपाई कहां से करेगा?
जाहिर है, कारोबार की लागत बढ़ेगी तो उसका असर सामान की कीमतों पर पड़ सकता है। आखिरकार खिलौने खरीदने वाला बच्चा, चूड़ियां खरीदने वाली महिला और घर की जरूरत का सामान लेने वाला किसान-मजदूर ही इस बोझ को महसूस कर सकता है।
**दुकान का किराया बढ़ेगा तो कीमतें बढ़ने का खतरा भी बढ़ेगा। सवाल यह है कि मेले में कमाई कौन करेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा?**
गरीब परिवार के लिए मेला सिर्फ मनोरंजन नहीं, साल भर की छोटी-छोटी खुशियों का अवसर भी होता है। लेकिन यदि मेले की व्यवस्था पर कथित दबाव और अवैध वसूली हावी हुई, तो यह खुशी भी आम आदमी की जेब पर भारी पड़ सकती है।
## अधिकारी खामोश क्यों? व्यापारियों की सुनवाई कौन करेगा?
व्यापारियों की ओर से यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि शिकायत करने पर अधिकारियों से संपर्क नहीं हो पा रहा है और उनकी समस्याओं पर सुनवाई नहीं की जा रही। यह दावा भी सामने आया है कि राजनीतिक दबाव और तबादले की आशंका के कारण अधिकारी-कर्मचारी खुलकर कार्रवाई करने से बच रहे हैं।
हालांकि, अधिकारियों के भोपाल में रहने, फोन नहीं उठाने या राजनीतिक दबाव में काम करने जैसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। लेकिन यदि व्यापारी वास्तव में अपनी शिकायत लेकर भटक रहे हैं, तो नगर पालिका प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
आखिर मेले की व्यवस्था देखने की जिम्मेदारी किसकी है? दुकानों का आवंटन किस प्रक्रिया से हुआ? निर्धारित शुल्क कितना है? किस व्यापारी से कितनी राशि ली जा रही है? क्या दुकानों की सूची और आवंटन की शर्तें सार्वजनिक की गई हैं?
इन सवालों के जवाब जनता को मिलने चाहिए।
## भाजपा नेताओं से भी सवाल—क्या यही है गरीबों की सेवा?
यदि किसी जनप्रतिनिधि या उसके करीबी पर दुकान आवंटन में दबाव बनाने अथवा निर्धारित शुल्क से अधिक रकम लेने का आरोप है, तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
राजनीति में जनता की सेवा के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन अगर किसी मेले में गरीब व्यापारी दबाव महसूस करे और आम आदमी को महंगा सामान खरीदने की नौबत आए, तो जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होना भी जरूरी है।
**जनता ने प्रतिनिधि इसलिए नहीं चुने कि उसकी खुशियों के मेले पर किसी की कथित मनमानी का पहरा बैठ जाए।**
## प्रशासन बताए—आखिर चल क्या रहा है?
छतरपुर नगर पालिका और जिला प्रशासन को चाहिए कि जल विहार मेले की दुकानों के आवंटन, निर्धारित शुल्क और वास्तविक भुगतान की जांच कराएं। आवंटन सूची सार्वजनिक करें, व्यापारियों की शिकायतें दर्ज करें और यह स्पष्ट करें कि किसी दुकान पर अनधिकृत कब्जे या दबाव की शिकायत सही है या नहीं।
क्योंकि सवाल सिर्फ दुकानों का नहीं है। सवाल उस गरीब परिवार की जेब का है, जो साल भर इंतजार करके मेले में आता है। सवाल उस छोटे व्यापारी का है, जो मेहनत से रोजी-रोटी कमाना चाहता है। और सवाल उस प्रशासन की जवाबदेही का है, जिसे नियमों के अनुसार काम करना चाहिए।
**आखिरी सवाल—जल विहार मेला जनता की खुशियों के लिए है या कुछ रसूखदारों की कमाई के लिए?**
अगर आरोप गलत हैं, तो जिम्मेदार लोग सामने आकर तथ्य रखें। और अगर आरोप सही हैं, तो जांच और कार्रवाई होनी चाहिए। छतरपुर की जनता को जवाब चाहिए—क्योंकि मेले में गरीब की जेब कटे और जिम्मेदार खामोश रहें, यह व्यवस्था किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकती।
*नोट: दुकानों के आवंटन और कथित वसूली से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित पार्षदों, नेताओं और नगर पालिका अधिकारियों का पक्ष लिया जाना बाकी है।*