अन्ना हज़ारे और सोनम वांगचुक के अनशन की तुलना कई सवाल खड़े करती है,2011 में अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला,लंबे जनदबाव के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने उनसे बातचीत की और उनकी कई मांगों पर विचार करने की प्रक्रिया शुरू की.......!
दूसरी ओर,सोनम वांगचुक ने लद्दाख से जुड़े मुद्दों, जैसे संवैधानिक सुरक्षा,पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर भूख हड़ताल की,उनके आंदोलन को भी समर्थन मिला,लेकिन कई लोगों का मानना है कि उनकी मांगों पर अपेक्षित स्तर की राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली......!
यही वजह है कि आज लोग सवाल पूछ रहे हैं,क्या आंदोलनों को सरकारें उनके मुद्दों के आधार पर सुनती हैं,या फिर राजनीतिक परिस्थितियाँ भी प्रतिक्रिया तय करती हैं?लोकतंत्र की ताकत यही है कि असहमति को सुना जाए......!
संवाद हो और शांतिपूर्ण आंदोलनों को गंभीरता से लिया जाए,किसी भी सरकार से यही अपेक्षा होती है कि वह नागरिकों की आवाज़ को समय रहते सुने आख़िरकार, लोकतंत्र में संवाद टकराव से अधिक शक्तिशाली होता है......!
और किसी भी नागरिक का जीवन किसी भी राजनीतिक मतभेद से अधिक मूल्यवान है......!