पांगी के जंगलों पर मंडराता खतरा: रिजर्व फॉरेस्ट में क्रशर, वन भूमि में शराब का ठेका और वन विभाग को भनक तक नहीं!
सुरेंद्र ठाकुर
किलाड़, पांगी 19 जून
जनजातीय एवं पर्यावरणीय दृष्टि से अति संवेदनशील पांगी घाटी में वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। वन परिक्षेत्र किलाड़ के अंतर्गत आने वाले शटवानी रिजर्व फॉरेस्ट (आरएफ) क्षेत्र में कथित तौर पर संचालित किए जा रहे क्रशर और साच वन परिक्षेत्र के चैरी बंगला आरएफ क्षेत्र में खुले शराब के ठेके को लेकर स्थानीय लोगों में भारी रोष है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी वन विभाग के कंधों पर है, उन्हीं जंगलों में हो रही गतिविधियों की जानकारी तक विभाग के उच्च अधिकारियों को नहीं है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि शटवानी जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में क्रशर संचालन से पर्यावरण, वन संपदा, जल स्रोतों और वन्यजीवों पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। क्रशर से निकलने वाला मलबा और धूल जंगलों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ सकती है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक न तो वन विभाग ने कोई स्पष्ट रुख अपनाया है और न ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से कोई सार्वजनिक जानकारी सामने आई है।
गरीब की लकड़ी पर सख्ती, प्रभावशालियों पर खामोशी?
ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग वर्षों पुरानी लकड़ी रखने वाले गरीब ग्रामीणों के खिलाफ तो तुरंत कार्रवाई कर देता है और कानून की दुहाई देता है, लेकिन जब बात जंगलों के भीतर बड़े स्तर पर हो रही गतिविधियों की आती है तो विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
लोग पूछ रहे हैं कि क्या वन कानून केवल आम जनता के लिए हैं? यदि किसी ग्रामीण के घर में लकड़ी मिल जाए तो मामला दर्ज हो सकता है, लेकिन रिजर्व फॉरेस्ट में क्रशर स्थापित होने की खबर विभाग को नहीं है। यह स्थिति विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
जनता की बिजली रुकी, लेकिन क्रशर पर कोई सवाल नहीं
ग्रामीणों ने याद दिलाया कि गत वर्ष थिरोट-किलाड़ 33 केवी विद्युत लाइन परियोजना को वन संरक्षण अधिनियम और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का हवाला देकर रोक दिया गया था। वह परियोजना हजारों लोगों को बेहतर बिजली सुविधा देने से जुड़ी थी। तब नियम-कायदों की दुहाई दी गई, लेकिन अब जंगल के भीतर क्रशर स्थापना जैसे मामलों में विभागीय चुप्पी लोगों को खटक रही है।
लोगों का कहना है कि यदि जनता के हितों से जुड़ी परियोजनाओं पर कानून लागू हो सकते हैं तो फिर जंगलों में व्यावसायिक गतिविधियों पर वही सख्ती क्यों नहीं दिखाई जा रही?
वन विभाग को नहीं पता, तो फिर निगरानी कौन कर रहा है?
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू तब सामने आया जब वन मंडल अधिकारी रवि गुलेरिया ने स्वीकार किया कि शटवानी में लगाए जा रहे क्रशर का मामला उनके संज्ञान में नहीं है और इस संबंध में वन परिक्षेत्र अधिकारी से जानकारी मांगी जाएगी।
यह बयान अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र में इस स्तर की गतिविधि चल रही है और वन मंडल अधिकारी को इसकी जानकारी तक नहीं है, तो फिर जंगलों की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है? क्या फील्ड स्टाफ समय पर रिपोर्ट नहीं दे रहा या फिर पूरा तंत्र केवल कागजों तक सीमित रह गया है?
चैरी बंगला में शराब ठेके पर भी उठे सवाल
साच वन परिक्षेत्र के चैरी बंगला आरएफ क्षेत्र में खुले शराब के ठेके को लेकर भी ग्रामीणों ने आपत्ति जताई है। वन मंडल अधिकारी के अनुसार संबंधित शेड की डिमार्केशन के लिए गत वर्ष राजस्व विभाग को पत्र लिखा गया था, लेकिन आज तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि भूमि की स्थिति ही स्पष्ट नहीं है तो वहां व्यावसायिक गतिविधि कैसे संचालित हो रही है?
ग्रामीणों की मांग: हो निष्पक्ष जांच
स्थानीय निवासी केसर सिंह, कश्मीर सिंह, राज कुमार, सुरेंद्र राणा और बहादुर सिंह सहित अन्य ग्रामीणों ने प्रशासन, वन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उच्च अधिकारियों से मांग की है कि शटवानी आरएफ क्षेत्र में संचालित क्रशर की अनुमति, पर्यावरणीय मंजूरी, वन स्वीकृति तथा मलबा निस्तारण की व्यवस्था की निष्पक्ष जांच करवाई जाए। साथ ही यह भी सार्वजनिक किया जाए कि इस परियोजना को किस आधार पर अनुमति प्रदान की गई।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी प्रकार के नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार पक्षों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
सवाल जो जवाब मांग रहे हैं
क्या रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र में क्रशर स्थापित करने की सभी कानूनी मंजूरियां ली गई हैं?
क्या पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया गया है?
मलबा और अवशेष कहां डाले जाएंगे?
यदि वन मंडल अधिकारी को जानकारी नहीं थी तो स्थानीय स्तर पर निगरानी कौन कर रहा था?
चैरी बंगला में शराब ठेका वन भूमि पर है या नहीं, इसकी स्थिति आज तक स्पष्ट क्यों नहीं हो पाई?
(नोट: यह समाचार स्थानीय ग्रामीणों द्वारा उठाई गई चिंताओं, आरोपों और वन मंडल अधिकारी के आधिकारिक बयान पर आधारित है। संबंधित विभागों का विस्तृत पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)
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Chamba, Chamba | Jun 19, 2026