स्थानीय लोगों के पेट पर लात क्यों?
धारी देवी के समीप स्थित चर्चित पर्यटन स्थल "मिनी गोवा" इन दिनों बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। नदी के किनारे का प्राकृतिक सौंदर्य और रोमांचक वातावरण लोगों को यहां खींच लाता है। लेकिन हर बार जब पर्यटकों की आवाजाही बढ़ती है, प्रशासन सुरक्षा का हवाला देकर लोगों को वहां से हटाने में जुट जाता है।
निस्संदेह, किसी भी प्रशासन की पहली जिम्मेदारी लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यदि किसी स्थान पर वास्तविक खतरा है तो आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि यदि यह स्थान इतना ही असुरक्षित है तो फिर इसके लिए स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला जा रहा? केवल पर्यटकों को खदेड़ देना क्या समस्या का समाधान है?
मिनी गोवा के आसपास दर्जनों स्थानीय परिवारों ने अपनी आजीविका के लिए छोटी-छोटी दुकानें, खाद्य स्टॉल और अन्य व्यवसाय शुरू किए हैं। पर्यटन बढ़ने से इन लोगों की आय में वृद्धि हुई और क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा हुए। लेकिन जब प्रशासन अचानक पर्यटकों को वहां जाने से रोक देता है तो सबसे बड़ा नुकसान इन्हीं स्थानीय लोगों को उठाना पड़ता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन के पास केवल प्रतिबंध लगाने का विकल्प दिखाई देता है, जबकि सुरक्षा के लिए चेतावनी बोर्ड, बैरिकेडिंग, लाइफ जैकेट, प्रशिक्षित बचाव दल और निगरानी व्यवस्था जैसी सुविधाएं विकसित करने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए जाते। यदि व्यवस्थाएं विकसित की जाएं तो सुरक्षा भी बनी रह सकती है और स्थानीय लोगों का रोजगार भी प्रभावित नहीं होगा।
दरअसल, पहाड़ों में रोजगार के अवसर पहले ही सीमित हैं। ऐसे में पर्यटन ही स्थानीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरा है। यदि प्रशासन बार-बार सुरक्षा का हवाला देकर पर्यटन गतिविधियों पर रोक लगाता है, तो उसे यह भी बताना होगा कि स्थानीय लोगों के रोजगार और आजीविका की भरपाई कैसे होगी।
जरूरत इस बात की है कि प्रशासन केवल रोक लगाने की नीति से बाहर निकले और सुरक्षा तथा रोजगार के बीच संतुलन स्थापित करे। आखिर विकास का उद्देश्य लोगों की जिंदगी बेहतर बनाना है, न कि उनके पेट पर लात मारना। मिनी गोवा के मामले में भी स्थायी और व्यावहारिक समाधान निकालने का समय आ गया है।
Parliament Street, New Delhi | Jun 9, 2026