सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि क्लाइंट की स्पष्ट इजाजत के बिना कोई अधिवक्ता उसकी ओर से किसी समझौते में शामिल होने का अधिकार नहीं रखता। अदालत ने यह भी साफ किया कि कानूनी प्रावधान यह है कि समझौते पर सभी पक्षकारों के दस्तखत होने चाहिए। यह विवाद वर्ष 1989 में दायर पुश्तैनी संपत्ति बंटवारे के मुकदमे से जुड़ा था।
फरवरी 1994 में ट्रायल कोर्ट ने पक्षकारों की ओर से संयुक्त रूप से दायर आवेदन के आधार पर समझौता डिक्री (Compromise Decree) पारित कर दी थी। वर्ष 1997 में अंतिम डिक्री भी पारित हुई। करीब 28 साल बाद एक प्रतिवादी के कानूनी उत्तराधिकारियों ने इस समझौता डिक्री को चुनौती देते हुए दावा किया कि उनके पूर्वज ने कभी समझौते पर साइन नहीं किए थे और न ही किसी अधिवक्ता को उनकी ओर से समझौता करने का अधिकार दिया था। यह भी आरोप लगाया कि वकालतनामा और लिखित बयान जाली थे।
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Korba, Korba | Jul 4, 2026