भ्रष्टाचार पर नकेल जरूरी: जनता के विश्वास से खिलवाड़ कब तक?
संगरिया की आवाज़।
लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है, सरकारें बनाती है और उन्हीं से विकास, पारदर्शिता तथा ईमानदारी की अपेक्षा रखती है। लेकिन जब जनता के विश्वास को ठेस पहुंचती है, तब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। दुर्भाग्य से आज देश के कई राज्यों की तरह राजस्थान में भी समय-समय पर विभिन्न विभागों में भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और घोटालों के आरोप सामने आते रहे हैं। यह स्थिति केवल किसी एक राजनीतिक दल, एक सरकार या एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी समस्या है जिसने व्यवस्था के कई हिस्सों को प्रभावित किया है।
पिछले वर्षों में विभिन्न सरकारों के कार्यकाल के दौरान कई मामलों को लेकर सवाल उठे। कभी भर्ती प्रक्रियाओं पर प्रश्नचिह्न लगे, कभी प्रशासनिक स्तर पर अनियमितताओं के आरोप लगे और कभी किसानों, युवाओं तथा आम नागरिकों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता पर बहस हुई। यह भी सत्य है कि किसी भी व्यवस्था में अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी ईमानदारी से कार्य करते हैं, लेकिन कुछ भ्रष्ट तत्व पूरे तंत्र की छवि खराब कर देते हैं।
भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह केवल सरकारी खजाने को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि आम आदमी के अधिकारों का भी हनन करता है। जब किसी किसान को समय पर खाद, बीज या अन्य आवश्यक सुविधाएं नहीं मिलतीं, जब किसी युवा को योग्यता के बावजूद नौकरी नहीं मिलती, जब किसी गरीब को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, तब सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है।
यह भी देखा गया है कि कई बार भ्रष्टाचार केवल नेताओं या केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं रहता। कुछ मामलों में राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत दोनों की चर्चा होती है। यदि किसी विभाग में गलत कार्य हो रहा है तो उसकी जानकारी अक्सर संबंधित अधिकारियों को होती है। वहीं यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी नियमों के विरुद्ध कार्य करता है और उसे राजनीतिक संरक्षण मिलता है, तो स्थिति और गंभीर हो जाती है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल एक पक्ष के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में जवाबदेही स्थापित करने की लड़ाई होनी चाहिए।
राजस्थान में कृषि क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर समय-समय पर बहस होती रही है। किसानों ने कई बार बीज, खाद, सिंचाई और खरीद व्यवस्था को लेकर अपनी समस्याएं उठाई हैं। यदि कहीं भी किसानों के हितों के साथ खिलवाड़ हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसान देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और उसके साथ किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों मिलकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर और प्रभावी कदम उठाएं। केवल जांच बैठा देना पर्याप्त नहीं है। दोषियों की पहचान, निष्पक्ष जांच, समयबद्ध कार्रवाई और कठोर दंड सुनिश्चित होना चाहिए। यदि कोई नेता दोषी है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए, यदि कोई अधिकारी दोषी है तो उसे भी कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। कानून की नजर में सभी समान होने चाहिए।
साथ ही, भ्रष्टाचार रोकने के लिए तकनीक का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए। भर्ती प्रक्रियाओं, टेंडर प्रणाली, सरकारी खरीद, अनुदान वितरण और प्रशासनिक कार्यों को अधिकतम डिजिटल बनाया जाए ताकि मानवीय हस्तक्षेप कम हो और पारदर्शिता बढ़े। व्हिसलब्लोअर (सूचना देने वाले) लोगों को सुरक्षा दी जानी चाहिए ताकि ईमानदार अधिकारी और नागरिक बिना डर के भ्रष्टाचार की जानकारी दे सकें।
जनता भी इस लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। रिश्वत देने और लेने दोनों को सामाजिक बुराई मानते हुए उसका विरोध करना होगा। लोकतंत्र में जनता की जागरूकता ही सबसे बड़ी ताकत है। जब नागरिक सवाल पूछेंगे, सूचना का अधिकार इस्तेमाल करेंगे और जवाबदेही मांगेंगे, तब व्यवस्था पर सकारात्मक दबाव बनेगा।
आज जरूरत किसी एक दल को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुधारने की है। सत्ता में कोई भी दल हो, जनता की अपेक्षा एक ही रहती है—ईमानदार शासन, पारदर्शी प्रशासन और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था। यदि सरकारें और प्रशासन जनता के विश्वास को सर्वोच्च मानकर कार्य करें, तो भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।
राजस्थान सहित पूरे देश में यह संदेश स्पष्ट जाना चाहिए कि भ्रष्टाचार करने वाला चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे कानून के दायरे में आना ही होगा। जनता का पैसा जनता के विकास पर खर्च होना चाहिए, न कि भ्रष्ट लोगों की तिजोरियां भरने में। यही लोकतंत्र की असली भावना है और यही एक मजबूत, पारदर्शी तथा विकसित भारत की नींव भी है।
Vijay Singh Beniwal
संगरिया की आवाज़