सियासत की आग में बचपन क्यों?
पुतला दहन में नारे लगाता करीब 12 साल का बच्चा, आखिर बच्चों को राजनीति के प्रदर्शनों में क्यों लाया जा रहा है?
मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी के विरोध में कांग्रेस ने प्रदर्शन किया, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नारेबाजी हुई और पुतला दहन भी किया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीरों में दिखाई दे रहा एक दृश्य कई सवाल खड़े करता है।
तस्वीरों में करीब 12 साल का एक बच्चा पुतला दहन के दौरान नारेबाजी करता नजर आ रहा है।
सवाल यह नहीं कि विरोध प्रदर्शन किस पार्टी ने किया, सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों में बच्चों की भागीदारी को लेकर भी जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए?
क्या इस उम्र में बच्चों को राजनीतिक टकराव वाले प्रदर्शनों का हिस्सा बनाना उचित है?
क्या राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी नहीं कि बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और निष्पक्ष सोच को प्राथमिकता दें?
क्या नेताओं को यह नहीं सोचना चाहिए कि जिस उम्र में बच्चे को किताबों, खेल और बेहतर भविष्य की जरूरत है, उस उम्र में उसे राजनीतिक नारों के बीच खड़ा करना कितना उचित है?
लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है, लेकिन उस अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
राजनीतिक दल कोई भी हो, विचारधारा कोई भी हो—बच्चों के हित और सुरक्षा को राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए। बच्चों को जागरूक नागरिक बनाना अच्छी बात है, लेकिन उन्हें राजनीतिक प्रदर्शन का हिस्सा बनाने से पहले उनकी उम्र, सुरक्षा और हितों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।
राजनीति अपनी जगह, बचपन अपनी जगह!
सवाल किसी एक पार्टी से नहीं, हर उस राजनीतिक नेतृत्व से है जो लोकतंत्र की बात करता है।
क्या आप मानते हैं कि राजनीतिक प्रदर्शनों में बच्चों की भागीदारी को हतोत्साहित किया जाना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
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