पारस हेल्थ गुरुग्राम में स्पेशलाइज्ड ब्रेन सर्जरी के बाद 10 साल की बच्ची मिर्गी दौरे से हुई मुक्त, बच्ची सालों से कई ड्रग-रेसिस्टेंट मिर्गी से थी ग्रस्त
गुरुग्राम, गौरव गर्ग, 10 अगस्त । 10 साल की एक बच्ची सात अलग-अलग एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं के इलाज के बावजूद कई सालों से बार-बार पड़ने वाले मिर्गी के दौरों से जूझ रही थी। अब वह पारस हेल्थ गुरुग्राम में की गई स्पेशलाइज्ड एपिलेप्सी सर्जरी के बाद अब पूरी तरह दौरे से मुक्त है।
बच्ची को उसकी माँ पारस हेल्थ गुरुग्राम के न्यूरोलॉजी OPD में लाई थी। बच्ची को 10 महीने की उम्र से बार-बार दौरे पड़ते थे। सात एंटी-एपिलेप्टिक दवाएँ लेने के बावजूद उसे बार-बार दौरे पड़ते रहे। इन दौरों के कारण उसकी वृद्धि, विकास, सीखने की क्षमता और जीवन की पूरी गुणवत्ता पर काफी असर पड़ा। स्पेशल ज़रूरतों वाली बच्ची होने के नाते उसकी हालत को मैनेज करना मेडिकल टीम और उसके परिवार दोनों के लिए खास तौर पर मुश्किल था। बच्ची में किसी भी बड़ी न्यूरोलॉजिकल बीमारी की कोई फैमिली हिस्ट्री नहीं थी।
मरीज़ को जुलाई के अंत में न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट में भर्ती कराया गया था और पारस हेल्थ गुरुग्राम की न्यूरोलॉजी चेयरपर्सन डॉ. (प्रो.) एम. वी. पद्मा श्रीवास्तव की देखरेख में उसका व्यापक न्यूरोलॉजिकल मूल्यांकन किया गया। उन्हें लेफ्ट मेसियल टेम्पोरल स्क्लेरोसिस की वजह से मल्टीड्रग-रेसिस्टेंट (इंट्राक्टेबुल) एपिलेप्सी होने का पता चला। इसमें नियोकॉर्टेक्स का एक हिस्सा भी दौरे पैदा करने वाले ज़ोन में शामिल पाया गया।
मामले की जटिलता को देखते हुए मरीज़ की जांच न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी टीमों की लीडरशिप में एक मल्टीडिसिप्लिनरी एपिलेप्सी टीम ने की। टीम में पारस हेल्थ गुरुग्राम के न्यूरोसर्जरी के डायरेक्टर डॉ. पुनीत राणा और न्यूक्लियर मेडिसिन की डायरेक्टर डॉ. सुरभि पांडे शामिल थीं।
सर्जरी की सटीकता के लिए टीम ने एडवांस्ड स्कैन का उपयोग किया, जैसे कि न्यूरोनेविगेशन के साथ एपिलेप्सी-स्पेसिफिक MRI, डिफ्यूज़न टेन्सर इमेजिंग (DTI) और PET स्कैन आदि। इनसे उन्हें दिमाग के ज़रूरी कामों को सुरक्षित रखते हुए दौरे वाले हिस्से का सही-सही पता लगाने में मदद मिली। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि दौरे का केंद्र (सीज़र फ़ोकस) नरम था और उसका पता लगाना मुश्किल था, जिससे सर्जरी की योजना बनाना और सर्जरी करना दोनों ही बहुत मुश्किल हो गए थे।
इस मामले के बारे में बताते हुए पारस हेल्थ गुरुग्राम के न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट की चेयरपर्सन पद्म श्री डॉ (प्रो.) M V पद्मा श्रीवास्तव ने कहा, “ड्रग-रेसिस्टेंट मिर्गी (दवाओं से ठीक न होने वाली मिर्गी) का मतलब सिर्फ़ बार-बार दौरे पड़ना नहीं है। यह बच्चे के दिमाग के विकास, पढ़ाई-लिखाई, व्यवहार और भविष्य पर असर डाल सकती है। कई परिवार सालों तक दवाएं बदलते रहते हैं, जबकि उन्हें पता नहीं होता कि कुछ बच्चों के लिए सर्जरी एक बेहतर विकल्प हो सकती है। सबसे ज़रूरी कदम है दिमाग के उस हिस्से की सही पहचान करना जिसकी वजह से दौरे पड़ते हैं। यह काम वीडियो EEG, मिर्गी-प्रोटोकॉल MRI, PET स्कैन, SPECT स्कैन और दूसरी स्पेशलाइज्ड जांचों जैसे एडवांस्ड टेस्ट से किया जा सकता है। इसके बाद स्पेशलिस्ट की एक टीम इलाज की योजना बनाती है। जब सही मरीज़ की सही समय पर मिर्गी की सर्जरी की जाती है, तो इससे बच्चे की ज़िंदगी की गुणवत्ता में बहुत सुधार हो सकता है। कई मामलों में इससे बच्चे अपनी सामान्य गतिविधियों में वापस लौट पाते हैं और दवाओं पर उनकी निर्भरता कम हो जाती है।”
पारस हेल्थ गुरुग्राम के न्यूरोसर्जरी के डॉयरेक्टर डॉ पुनीत राणा ने कहा, “यह सर्जरी तकनीकी रूप से बहुत जटिल थी क्योंकि एडवांस्ड इमेजिंग के बावजूद दौरे पैदा करने वाले हिस्से (एपिलेप्टोजेनिक फोकस) का पता लगाना मुश्किल था। न्यूरोनेविगेशन और इंट्राऑपरेटिव ECoG ने दौरे पैदा करने वाले टिश्यू की सही पहचान करने और उसे सुरक्षित रूप से हटाने में अहम भूमिका निभाई, साथ ही दिमाग के ज़रूरी कामों को भी सुरक्षित रखा। सफल नतीजा यह दिखाता है कि दवा-प्रतिरोधी मिर्गी (ड्रग-रेसिस्टेंट एपिलेप्सी) के सावधानी से चुने गए मामलों में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों के सहयोग और समय पर सर्जरी से सफल परिणाम हासिल किया जा सकता है।”
न्यूरोनेविगेशन गाइडेंस का उपयोग करते हुए डॉ पुनीत राणा ने लगभग 4 घंटे में सर्जरी पूरी की। यह सर्जरी कम-से-कम चीर-फाड़ वाली थी और इसमें दिमाग के उस छोटे से हिस्से (1.5 cm) को हटाया गया जहाँ से दौरे शुरू हो रहे थे। इसके बाद 'सेलेक्टिव एमिग्डालोहिप्पोकैम्पेक्टोमी' की गई। इस प्रक्रिया में ECoG के ज़रिए लगातार दिमाग की गतिविधि की निगरानी की गई। पूरी प्रक्रिया की योजना बहुत सावधानी से बनाई गई थी ताकि भाषा के लिए ज़िम्मेदार दिमाग के हिस्सों और दिमाग के अंदरूनी हिस्सों तक खून पहुँचाने वाली ज़रूरी रक्त वाहिकाओं को सुरक्षित रखा जा सके।
मरीज़ की रिकवरी बिना किसी बाधा के अच्छी हुई। उसमें कोई दिमाग़ी समस्या या कमी नहीं दिखी। सर्जरी के 5 दिन बाद ही उसे स्थिर हालत में डिस्चार्ज कर दिया गया। बाद की फ़ॉलो-अप विजिट के दौरान उसे दौरे नहीं पड़े हैं, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता में काफ़ी सुधार हुआ है। उसके डॉक्टर उसकी लगातार हो रही प्रगति के आधार पर समय के साथ उसकी एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं को धीरे-धीरे कम करने की योजना बना रहे हैं।
इलाज़ करने वाली टीम के अनुसार केवल 12 से 15 % मिर्गी मरीज़ ही 'लेज़ियोनेक्टॉमी' वाली सर्जरी के लिए काबिल होते हैं। हालाँकि सावधानी से चुने गए इन मरीज़ों के लिए समय पर सर्जरी से लंबे समय तक दौरे पर नियंत्रण पाया जा सकता है और न्यूरोलॉजिकल नतीजों व जीवन की गुणवत्ता में काफ़ी सुधार हो सकता है।
एक्सपर्ट्स ने यह भी बताया कि हर व्यक्ति के लिए मिर्गी के दौरे शुरू होने की वजहें अलग-अलग हो सकती हैं। हालांकि नींद की कमी, खाना न खाना, स्क्रीन पर बहुत ज़्यादा समय बिताना और तेज़ चमकती रोशनी के संपर्क में आने से कुछ लोगों में दौरे पड़ सकते हैं। जिन मरीज़ों के दौरे दवाओं से नियंत्रित नहीं हो पाते, उनकी जल्द ही किसी खास मिर्गी इलाज केंद्र (स्पेशलाइज़्ड एपिलेप्सी सेंटर) में जांच होनी चाहिए। सही तरह से चुने गए मरीज़ों के लिए सर्जरी से दौरे को बेहतर ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है और उनकी जीवन की गुणवत्ता में काफ़ी सुधार हो सकता है।
Jhajjar, Jhajjar | Aug 10, 2026