मसूरी की चमकती तस्वीरों के पीछे एक ऐसा परिवार है, जहां बीमारी से बड़ी चिंता इलाज के खर्च की है और सरकारी व्यवस्था से बड़ा सवाल उसके कागजों का है। वोट लेने के लिए पहचान मिल जाती है…
लेकिन इलाज के लिए पहचान साबित नहीं हो पा रही!
खबर मसूरी से है जहां ओंकार की पत्नी पिछले दो साल से पैरालिसिस के चलते बिस्तर पर है। अब जांच में ओंकार के दिल में दो छेद होने की बात सामने आई है। डॉक्टरों ने इलाज की सलाह दी है, लेकिन परिवार की आर्थिक हालत ऐसी है कि इलाज कराना मुश्किल है। इकलौता बेटा मजदूरी करके घर चला रहा है।
लेकिन कहानी सिर्फ बीमारी और गरीबी की नहीं है… कहानी उस व्यवस्था की भी है, जहां ओंकार का आधार कार्ड तक नहीं बन पा रहा।
ओंकार का कहना है कि वह हर चुनाव में वोट डालता है। यहां तक कि SIR के दौरान उसने अपने परिवार के सभी प्रोफ भी जमा किए, लेकिन उसका आधार कार्ड हर बार रिजेक्ट हो जाता है।
अब सवाल उठना लाजमी है
जब वोट लेने के लिए ओंकार की पहचान स्वीकार है, तो फिर सरकारी स्वास्थ्य सुविधा लेने के लिए वही पहचान अधूरी क्यों पड़ जाती है?
सरकार गरीबों को आयुष्मान योजना के जरिए मुफ्त इलाज की सुविधा देने का दावा करती है। लेकिन ओंकार के मामले में आधार कार्ड नहीं बनने की वजह से आयुष्मान का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
तो एक आधार कार्ड गरीब की जिंदगी और इलाज के बीच दीवार कैसे बन गया?
और ओंकार का पड़ोसी तो इससे भी आगे की तस्वीर बता रहा है।
उसका कहना है कि इलाके में विकास के नाम पर कुछ नहीं है। सड़कें टूटी पड़ी हैं, स्वास्थ्य व्यवस्था खराब है और जनप्रतिनिधियों से लेकर सरकारी अधिकारियों तक शिकायत करके देख ली गई, लेकिन आज तक कोई खास सुधार नहीं हुआ।
यानी एक तरफ बीमारी से जूझता परिवार… दूसरी तरफ इलाज का खर्च… और तीसरी तरफ ऐसी सरकारी व्यवस्था, जिसमें आधार कार्ड बनवाना भी मुश्किल हो गया।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि ओंकार का इलाज कौन कराएगा।
सवाल यह भी है कि जिस सिस्टम तक पहुंचने के लिए गरीब को कागज चाहिए, वही कागज अगर सिस्टम बना ही नहीं पा रहा तो फिर उस गरीब की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
ओंकार आज मदद की उम्मीद में है। उसकी पत्नी बिस्तर पर है, बेटा मजदूरी कर रहा है और परिवार इलाज के लिए लोगों की ओर देख रहा है।
अब देखना यह है कि आयुष्मान का दावा ओंकार के लिए सिर्फ कागजों में रहता है या फिर जमीन पर भी कोई रास्ता निकलता है।
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