भारत दुनिया की चौथी सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति का उपयोग संकट में फँसे देशों की मदद के लिए करता है, उन पर हमला करने के लिए नहीं — चाहे वे भारत से 9,000 मील दूर ही क्यों न हों।
आज वेनेज़ुएला को जरूरत पड़ी, तो सबसे पहले भारत आया सहायता ले कर..... हमें नहीं पता कि भविष्य में वेनेज़ुएला भारत के साथ रहेगा या दुश्मन बन जाएगा.... लेकिन फिर भी भारत अपने फर्ज से पीछे नहीं हटेगा.
तुर्की में आए भीषण भूकंप के दौरान भी भारत ने एक अस्थायी अस्पताल स्थापित किया, जहाँ हजारों लोगों का निःशुल्क उपचार किया गया। साथ ही, भारतीय सेना ने तुर्की प्रशासन के साथ मिलकर मलबा हटाने और राहत एवं बचाव कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में तुर्की ने अपनी औकात और स्वभाव दिखाया..... यह बात और है कि अब तुर्की का भी इलाज किया जा रहा है.
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने केवल अपने नागरिकों को ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों के फँसे हुए नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला, जिनमें पाकिस्तान के नागरिक भी शामिल थे।
अप्रैल 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने चिकित्सा सहायता, राहत सामग्री और वित्तीय सहयोग प्रदान करते हुए पुनर्निर्माण कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई। भारत ने सबसे अधिक संख्या में सैनिक और बचाव दल भेजे तथा कई महीनों तक बिना किसी शुल्क के राहत एवं पुनर्वास अभियान चलाया।
इसी प्रकार, 2015 में यमन संकट के दौरान भारत ने अपने नागरिकों के साथ-साथ अमेरिका और यूरोप के उन नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला, जो वहाँ फँसे हुए थे और जिन्हें अपने देशों से तत्काल सहायता मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी।
इन सभी मानवीय अभियानों के लिए भारत ने किसी भी देश से एक भी पैसा नहीं लिया। भारत ने किसी देश को सहायता का बिल नहीं भेजा।
ऐसे देश के प्रति दुनिया को कृतज्ञ होना चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर उसे नस्लभेदी टिप्पणियों और भेदभाव का सामना करना पड़े.... खैर हमारे तो देश के नमूने ही विश्वगुरु के नाम का मखौल उड़ाते हैं.
विश्वगुरु यह होता है... जो सेना भेजता है... जीवन देने के लिए... किसी देश की संप्रभुता का उल्लंघन कर उनके राष्ट्रपति को अग़वा करने के लिए नहीं भेजता. भारत सेना भेजता है वहां के जन जीवन को पटरी पर लाने के लिए... ना कि उनके तेल के भण्डारों पर कब्ज़ा करने के लिए.
यह फर्क है.... और यह फर्क बना रहेगा.