अकादमी भवन में ‘संस्कृत ज्ञान परम्परा’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संस्कृत संगोष्ठी का आयोजन
पंचकूला, 25 अगस्त : हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के संस्कृत प्रकोष्ठ द्वारा महाराजा दाहिरसेन सभागार में संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य में ‘संस्कृत ज्ञान परम्परा’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संस्कृत संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आरम्भ में कार्यकारी उपाध्यक्ष, प्रो. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री,अकादमी सदस्य सचिव, श्री मंजीत सिंह, डाॅ. सी.डी.एस. कौशल, निदेशक, संस्कृत प्रकोष्ठ, डा. चन्द्र त्रिखा, निदेषक, उर्दू प्रकोष्ठ, प्रो. ललित कुमार गौड़, कुरुक्षेत्र, प्रो. वीरेन्द्र कुमार अलंकार, चण्डीगढ़ और डा. सुनील शास्त्री, मनसादेवी, पंचकूला ने सरस्वती माँ की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर व गुरुकुल के छात्रों ने स्वस्तीवाचन और सरस्वती वंदना गाकर कार्यक्रम की शुरूआत की।
अकादमी के कार्यकारी उपाध्यक्ष, प्रो. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि इस तरह की संगोष्ठियाँ हमेशा होती रहनी चाहिए ताकि बच्चों को संस्कृत ज्ञान ज्यादा से ज्यादा प्राप्त होता रहे। अकादमी सदस्य सचिव, श्री मनजीत सिंह ने कार्यक्रम में विषिष्ट अतिथि के रूप में पधार कर सभागार में उपस्थित सभी विद्वानों व श्रोताओं का स्वागत किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में संस्कृत ज्ञान परम्परा व आज की नई पीढ़ी को एआई के बारे में विस्तृत जानकारी दी।
उर्दू प्रकोष्ठ के निदेशक डा. चन्द्रत्रिखा ने इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि संस्कृत के मंत्रोंच्चारण से मानसिक शांति मिलती है।
कार्यक्रम में वक्ता के रूप में पधारे प्रो. वीरेन्द्र कुमार अलंकार, पूर्व प्रोफेसर पंजाब विवविद्यालय ने अपने वक्तव्य में कहा कि शब्दों के संसार में दिखावा बहुत है परन्तु संस्कृत भाषा में दिखावा नहीं है। उनका मत है आचार वाले को आचार्य कहा जाता है, संस्कृत जो भाषा है उसे आचार के साथ लाएंगे तो हमें बहुत ज्यादा ज्ञान प्राप्त होगा। जहाँ आचार होगा वहां आचार्य होगा।
उन्होंने एकपाद व द्विपाद का बहुत ही अच्छा उदाहरण देते हुए कहा कि एकपाद वायु है तो द्विपाद चंन्द्रमा को कहा जाता है। उन्होंने बताया कि इन्द्र शब्द का एक अर्थ जीवात्मा भी होता है।
प्रो. ललित कुमार गौड़, पूर्व प्रोफेसर, कुरुक्षेत्र विष्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र ने अपने वक्तव्य संबोधन में कहा कि जो पक्षी खाता है वह भोग भी करता है और जो देखता रहता है वह परमात्मा का रूप है। सारी आत्माओं का एक ही घर होता है, परमतत्त्व में विलीन हो जाना, माध्यम भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। उनका कहना है कि इंसान को किसी को भी अपमानित नहीं करना चाहिए। मनुष्य को भगवान ने बुद्धितत्त्व विशेष दिया है, इंसान के पास अगर बुद्धि नहीं है तो वह पशु सामान है। जो काम मनुष्य अपने बुद्धि और विवेक से कर सकता है वह पशु नहीं कर सकता।
डा. सुनील शास्त्री, मनसादेवी, पंचकूला ने कहा कि हमें संस्कृत को वर्तमान विज्ञान के साथ जोड़कर कार्य करना होगा, तभी हम अपने प्राच्य ज्ञान परम्परा को भावी पीढ़ी तक पहुंचा पाएंगे तथा राष्ट्रहित एवं समरसता के स्वप्न को साकार कर पाएंगे। संगोष्ठी के समापन अवसर पर संस्कृत प्रकोष्ठ के निदेशक डॉ. चित्तरंजन दयाल सिंह कौशल ने संस्कृत दिवस की शुभकामनाएं दी व सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का मंच संचालन डा. प्रतिभा वर्मा ने किया।