बिहार: कल दिल्ली के एक होटल में आग ने 21 जिंदगियों को निगल लिया..अभी उस आग की राख ठंडी भी नहीं हुई थी कि आज बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित प्रसाद अस्पताल के ICU में लगी आग ने कई जिंदगियां छीन लीं..
दिल्ली की घटना से शांति नहीं हुई, दूसरी ये घटना हो गई। यही इस सिस्टम की सच्चाई है। एक हादसे का मातम खत्म नहीं होता कि दूसरा हादसा दरवाजे पर खड़ा होता है।
लोग अस्पताल इलाज और जिंदगी बचाने जाते हैं, लेकिन अगर वहीं मौत मिल जाए तो जिम्मेदार कौन है?ICU में भर्ती मरीज तो भाग भी नहीं सकता। उसे बचाने की जिम्मेदारी किसकी थी?
कल फिर किसी और शहर की बारी होगी। फिर कोई होटल, कोई अस्पताल, कोई फैक्ट्री राख में बदलेगी और हम अखबार की हेडलाइन पढ़कर आगे बढ़ जाएंगे।
*सिस्टम का पैटर्न एक है:*
1. हादसा होता है
2. मंत्री और मुख्यमंत्री इसे "दुखद" बताते हैं
3. "जांच के आदेश" दे दिए जाते हैं
4. दो-चार दिन बाद 'ॐ शांति' के साथ फाइल बंद
दिल्ली के होटल हादसे के बाद होटल मंत्री और मुख्यमंत्री ने शोक जताकर चुप्पी साध ली। आज मुजफ्फरपुर के अस्पताल हादसे पर बिहार के स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री का बयान भी वही है - "दुखद घटना"।
*सवाल सीधे हैं:*
- प्रसाद अस्पताल के ICU को फायर NOC किसने दी?
- हर साल होने वाली सेफ्टी ऑडिट की रिपोर्ट कहां है?
- ICU में आग बुझाने के इंतजाम थे या नहीं, ये देखने की जिम्मेदारी किसकी थी?
- जब 21 लोग दिल्ली में जले, तब बिहार के अस्पतालों का सेफ्टी रिव्यू क्यों नहीं हुआ?
जब तक किसी मंत्री, किसी सचिव, किसी फायर ऑफिसर की कुर्सी नहीं जाएगी, तब तक ये सिलसिला चलता रहेगा। "दुखद" शब्द से ICU में जलते हुए मरीज वापस नहीं आते।
जिम्मेदारी तय किए बिना शोक जताना, सिर्फ अगली मौत का न्योता देना है..
बिहार: मंत्री जी, मुख्यमंत्री जी - ये आंसू आपके "शोक संदेश" से नहीं रुकेंगे..जवाब चाहिए...जिम्मेदारी तय कीजिए...