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25 साल का विकास… और आज भी कंधों पर जिंदगी! उत्तराखंड की सत्ता ने 25 साल में पहाड़ को क्या दिया—इसका जवाब भाषणों में नहीं, इन तस्वीरों में दिखाई देता है। जिस राज्य में सरकारें विकास के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के दावे करती हैं, उसी राज्य में एक मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए आज भी इंसान का कंधा ही एंबुलेंस बना हुआ है। यह सिर्फ सड़क की कमी नहीं है। यह पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की नाकामी है। गांवों में स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए, लेकिन डॉक्टर नहीं। अस्पताल बनाए गए, लेकिन विशेषज्ञ नहीं। योजनाएं बनीं, बजट आया, घोषणाएं हुईं—लेकिन जब किसी गरीब की जिंदगी बचाने की बारी आती है तो व्यवस्था उसके साथ खड़ी नजर नहीं आती। और यही सवाल धामी सरकार से भी है। सत्ता के मंचों से उत्तराखंड के विकास की तस्वीर दिखाई जाती है, लेकिन पहाड़ की वास्तविक तस्वीर छिपाई नहीं जा सकती। जिस प्रदेश में मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए परिजन कंधा लगाएं, वहां स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता के दावे जनता के जख्मों पर नमक के समान हैं। 25 साल में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन पहाड़ की मजबूरी क्यों नहीं बदली? कागजों पर विकास की रफ्तार चाहे जितनी तेज दिखाई जाए, अगर एक बीमार व्यक्ति समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकता तो वह विकास आम आदमी के लिए किस काम का? उत्तराखंड की जनता को भाषण नहीं चाहिए। इलाज चाहिए। डॉक्टर चाहिए। सड़क चाहिए। एम्बुलेंस चाहिए। और ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी की जिंदगी सिर्फ इसलिए खतरे में न पड़े क्योंकि वह पहाड़ के किसी दूरस्थ गांव में पैदा हुआ है। यह तस्वीर किसी राजनीतिक भाषण से बड़ा सवाल पूछ रही है— उत्तराखण्ड स्वाभिमान मोर्चा Bobby Panwar उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा जिला देहरादून,ऋषिकेश डोईवाला उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा रायपुर देहरादून टीम बॉबी चकराता विधानसभा आखिर 25 साल बाद भी पहाड़ का मरीज कंधों पर क्यों है? - Dehradun News