आराघर स्थित लालबती ऊपर से लिखा उत्तराखंड सरकार, खुलेआम बीच सड़क चल रही शराब पार्टी, ऐसे में कहा गयी दून पुलिस
सरकारी गाड़ी है, इसलिए क्या कानून से ऊपर है? सरकारी गाड़ी के अंदर दो लोग बैठकर शराब पी रहे हैं। सवाल यह है कि अगर यही काम किसी आम व्यक्ति की गाड़ी में होता, तो क्या पुलिस इतनी ही आसानी से इसे नजरअंदाज करती? पुलिस रोजाना अलग-अलग अभियानों के तहत कार्रवाई का दावा करती है। कभी शराब के खिलाफ अभियान, कभी वाहन चेकिंग, कभी नशे में वाहन चलाने वालों पर कार्रवाई—लेकिन जब मामला सरकारी गाड़ी का सामने आता है, तो कार्रवाई क्यों नजर नहीं आती? क्या सरकारी वाहन होने के नाम पर नियम-कायदे बदल जाते हैं? क्या पुलिस सरकारी गाड़ी के खिलाफ कार्रवाई करने से हिचक रही है? और अगर कार्रवाई नहीं हुई, तो इसकी वजह क्या है? आखिर कानून सबके लिए बराबर है या सरकारी गाड़ी के लिए अलग?