संसार और गृहस्थ में भी जीवन मुक्ति प्रदान करती है गुरु भक्तिः साध्वी भावना भारती जी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग एवं भजन संकीर्तन का आयोजन किया गया, जिसके दौरान परम पूजनीय दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री भावना भारती जी ने अपनी ओजस्वी वाणी के माध्यम से संसार की आसक्ति और गुरु की भक्ति के गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य को उजागर किया। साध्वी जी ने बताया कि मनुष्य संसार में रहते हुए अपने परिवार, संबंधों, धन-संपत्ति और भौतिक सुख-सुविधाओं से इस प्रकार आसक्त हो जाता है कि धीरे-धीरे यही आसक्ति उसके जीवन का केंद्र बन जाती है। संसार का कोई भी व्यक्ति अथवा वस्तु अपने आप में बंधन नहीं हैं अपितु उनके प्रति मन में उत्पन्न होने वाला अत्यधिक मोह और उनमें स्थायी सुख खोजने की प्रवृत्ति मनुष्य को मानसिक एवं आध्यात्मिक बंधनों में जकड़ लेती है। मनुष्य संसार के कार्यों में इतना उलझ जाता है कि वह अपने वास्तविक स्वरूप और जीवन के परम उद्देश्य को ही विस्मृत कर बैठता है। साध्वी भावना भारती जी ने समझाया कि संसार में रहते हुए आसक्ति के बंधनों से मुक्त होना ही वास्तविक आध्यात्मिक उपलब्धि है। जिस प्रकार कमल का पुष्प जल में रहकर भी उससे निर्लिप्त रहता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए आसक्ति से मुक्त जीवन जी सकता है यदि उसके जीवन में गुरु भक्ति रूपी सूर्य उदित हो जाए। जैसे कमल पुष्प सूर्य से नाता बनाए रखता है इसी प्रकार गुरु रूपी सूर्य से संबंध होने पर संसार में रहते हुए भी मन के बंधन टूट जाते हैं और हमें जीवन मुक्ति का सहज मार्ग प्राप्त होता है। जब सद्गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान के द्वारा मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है, तब उसकी दृष्टि बदलने लगती है। वह संसार के संबंधों को मोह का आधार बनाने के स्थान पर सेवा, निःस्वार्थ प्रेम और कर्तव्य की भावना से निभाना सीखता है। गुरु अपने तपोबल के द्वारा शिष्य को भीतर से आत्मिक संबल प्रदान करता है जिससे शिष्य प्रत्येक अवस्था में शांत चित्त एवं सहज रहता है। निरंतर गुरु आज्ञा में सत्संग, सेवा, साधना, सुमिरन के दिव्य मार्ग पे चलते हुए शिष्य का विवेक जागृत हो जाता है जिससे वह नश्वर संसार के बीच रहते हुए भी शाश्वत सत्य से अपना संबंध स्थापित कर पाता है। साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि जीवन मुक्ति का अर्थ संसार से पलायन करना नहीं, अपितु जीवन रहते हुए ही अज्ञान, अहंकार, मोह और आसक्ति के बंधनों से मुक्त हो जाना है। जब मनुष्य का मन परमात्मा में स्थिर होने लगता है, तब बाहरी परिस्थितियाँ उसके आंतरिक सुख और शांति को विचलित नहीं कर पातीं। वह परिवार और समाज के प्रति अपने दायित्वों को निभाते हुए भी भीतर से स्वतंत्र, शांत और आनंदमय जीवन जी सकता है। उन्होंने प्रेरित किया कि मनुष्य को अपने जीवन में गुरु भक्ति को स्थान देना चाहिए, क्योंकि गुरु की भक्ति केवल बाहरी श्रद्धा तक सीमित नहीं होती, अपितु यह जीवन की दिशा और दृष्टि को परिवर्तित करने वाली साधना है। जब मनुष्य गुरु के बताए मार्ग पर चलकर अपने भीतर के सत्य को जान लेता है, तब संसार में रहते हुए भी उसके लिए मुक्ति का द्वार खुल जाता है। विश्व शांति की प्रार्थना हेतु सामूहिक ध्यान साधना के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।
Ambala, Ambala | Oct 18, 2026