यह वो शहर है, जहां नाथ संप्रदाय के गुरु गोरक्षनाथ कभी धूनी रमाया करते थे। अपने आखिरी दिनों में इस शहर में ही आकर निर्गुण संत कबीर को सुकून मिला। यह है उत्तर प्रदेश का शहर गोरखपुर। गुरु गोरक्षनाथ की धरती गोरखपुर शहर एक बात के लिए और भी जाना जाता है। वह है धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन का सबसे बड़ा केंद्र गीताप्रेस माना जाता है। गीताप्रेस के शुरू होने की कहानी बेहद रोचक है, जिसकी शुरुआत सेठजी के नाम से मशहूर जयदयाजी गोयन्दका ने की थी। गुरुवार को इसी गीताप्रेस ने अपने बारे में चल रही अफवाहों को लेकर खंडन किया है।
राजस्थान के चुरू में जन्मे सेठजी यानी जयदयाल गोयन्दका के बारे में कहा जाता है कि जब वह कोई तेरह वर्ष के रहे होंगे, तब नाथ-संप्रदाय के संत मंगलनाथजी महाराज चुरू आए। झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ.संतोष तिवारी ने अपने एक लेख में लिखा है-'जयदयालजी के मन पर मंगलनाथजी के त्याग और वैराग्य की गहरी छाप पड़ी। जब वह
Korba, Korba | Jul 3, 2026