➡️ कहानी सच्ची है
➡️ एक बीज से शुरू हुई कहानी… अब 200 पौधों की हरित पाठशाला बन गई
कभी-कभी किसी बड़े बदलाव की शुरुआत किसी बड़ी योजना से नहीं, बल्कि एक छोटे-से बीज से होती है। सांदीपनि विद्यालय राहतगढ़ के प्राथमिक विभाग में शुरू हुई “पाठशाला नर्सरी” भी ऐसी ही एक छोटी-सी पहल थी, जिसका उद्देश्य केवल पौधे तैयार करना नहीं, बल्कि बच्चों को करके सीखने, प्रकृति को समझने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनने का अवसर देना था।
नर्सरी तैयार करने के लिए बच्चों ने अपने घरों से मिट्टी, गोबर की खाद, अलग-अलग पौधों के बीज तथा दूध की खाली पैकेट जैसी अनुपयोगी सामग्री एकत्र की। इन्हीं पैकेटों को गमलों का रूप देकर बच्चों ने उनमें बीज बोए। शुरुआत में बच्चों ने आम, नीम , मुनगा , खजूर , जामुन और इमली जैसे पौधों की गुठलियों से पौधे तैयार करने का प्रयास किया। इसके साथ ही अलग-अलग प्रकार के पौधों को नर्सरी में शामिल किया गया, ताकि बच्चे पौधों की विविधता को केवल किताबों में पढ़ने के बजाय उन्हें वास्तविक रूप में देखकर समझ सकें।
आज नर्सरी में अनेक प्रकार के पौधे विकसित हो रहे हैं। इनमें सोयाबीन, उड़द और मूंगफली जैसी फसल वाले पौधे, मिर्च और धनिया जैसे मसाले वाले पौधे, विभिन्न फूल वाले पौधे जैसे गेंदा, तथा बेल वाले पौधे जैसे करेला, लौकी और कद्दू भी शामिल हैं। इस विविधता ने नर्सरी को बच्चों के लिए एक वास्तविक जीवित प्रयोगशाला बना दिया है। कुल 100 बीजों से शुरू हुई इस यात्रा में लगभग 70 बीज सफलतापूर्वक पौधों में विकसित हो चुके हैं, जबकि आसपास से प्राकृतिक रूप से उगे छोटे पौधों को भी बच्चे नर्सरी में लाकर संरक्षित कर रहे हैं। इस तरह नर्सरी में अब लगभग 200 पौधे विकसित हो चुके हैं।
➡️ पौधों के साथ बच्चों का तुलनात्मक अध्ययन
इस नर्सरी की सबसे खास बात यह है कि बच्चे केवल पौधे उगा नहीं रहे, बल्कि उनके विकास का तुलनात्मक अध्ययन भी कर रहे हैं। बच्चे अलग-अलग पौधों की ऊंचाई, पत्तियों की संख्या, वृद्धि की गति, पानी की आवश्यकता और देखभाल में होने वाले अंतर का नियमित अवलोकन कर रहे हैं। वे अपने अवलोकनों को दर्ज करते हैं और अलग-अलग पौधों के विकास की तुलना करते हैं। इस प्रक्रिया में गणित उनके लिए किताब का विषय नहीं रह जाता—वे वास्तव में पौधों की ऊंचाई मापकर आंकड़े तैयार करते हैं। पर्यावरण अध्ययन में वे पौधों की पहचान, उनकी वृद्धि, आवश्यकताओं और उपयोग को समझते हैं तथा हिंदी में अपने अनुभवों और अवलोकनों को लिखकर व्यक्त करते हैं। इस तरह एक ही नर्सरी में हिंदी, गणित और पर्यावरण अध्ययन का सीखना स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से जुड़ गया है।
➡️ बरसात में उगे पौधों को मिला नया जीवन
कहानी यहीं नहीं रुकी। बरसात के दिनों में बच्चे अपने आसपास उगने वाले छोटे-छोटे पौधों पर भी नजर रखने लगे। कई पौधे बारिश के पानी से अपने आप उग आते हैं, लेकिन देखभाल न मिलने के कारण कुछ समय बाद सूख जाते हैं और स्वतः नष्ट हो जाते है । बच्चे ऐसे पौधों को पहचानकर सावधानीपूर्वक नर्सरी में स्थानांतरित कर रहे हैं और उनकी देखभाल कर रहे हैं। अर्थात् नर्सरी में केवल बच्चों द्वारा बोए गए बीज ही नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा स्वयं उगाए गए पौधों को भी नया जीवन मिल रहा है।
➡️ अब समाज भी बन रहा है इस हरित यात्रा का हिस्सा
धीरे-धीरे इस पहल की खुशबू विद्यालय की चारदीवारी से बाहर भी पहुंचने लगी। बच्चों के माता-पिता और अभिभावकों ने भी नर्सरी के लिए पौधे उपलब्ध कराकर इस अभियान में सहभागिता की। समाज के लोगों से भी आह्वान किया गया कि उनके आसपास बरसात में उगने वाले छोटे पौधे यदि देखभाल के अभाव में सूखने वाले हों, तो उन्हें विद्यालय की नर्सरी तक पहुंचाया जाए। बच्चे उन्हें विकसित करेंगे और आगे विद्यालय परिसर तथा समाज में रोपित किया जाएगा। इस तरह पाठशाला नर्सरी अब केवल विद्यालय की गतिविधि नहीं रही, बल्कि विद्यालय, परिवार और समाज की साझा हरित पहल बनती जा रही है।
➡️ बच्चों के हाथों तैयार पौधे बने सम्मान और स्नेह के उपहार
सबसे सुंदर पड़ाव तब आया, जब बच्चों द्वारा अपने हाथों से तैयार किए गए पौधे दूसरों के लिए उपहार बनने लगे। नर्सरी में बच्चों द्वारा तैयार किए गए पौधों को डाइट के प्राचार्य श्री अखिलेश पाठक, डाइट से श्री राजकुमार असाटी तथा पीपल फाउंडेशन, भोपाल से आए सदस्यों को स्नेहपूर्वक भेंट किया गया। यह केवल एक पौधे का उपहार नहीं था, बल्कि बच्चों की मेहनत, सीख और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का उपहार था। लोक शिक्षण संचलानय से असिस्टेंट डायरेक्टर श्रीमती साक्षी जैन ने भी बच्चों की इस अभिनव पहल की सराहना की और उनके प्रयासों को प्रोत्साहित किया। बच्चों के लिए इससे बड़ी खुशी क्या होगी कि जिस पौधे को उन्होंने बीज से तैयार किया, उसे वे स्वयं किसी अतिथि को अपने हाथों से भेंट कर रहे हैं।
➡️ अब पौधे उगेंगे भी और बच्चों की कहानियां भी
नर्सरी की पूरी यात्रा को बच्चों की अभिव्यक्ति से जोड़ते हुए आगे दीवार पत्रिका (बाल पत्रिका) तैयार की जाएगी। इसमें बच्चे अपने अनुभव, पौधों के विकास के आंकड़े, चित्र, तुलनात्मक अध्ययन, अवलोकन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद बच्चों की सीख और उनके कार्यों को समाज के सामने रखने के लिए बाल मेला आयोजित किया जाएगा, जिसमें बच्चे स्वयं अपनी नर्सरी, पौधों की विकास यात्रा और उससे मिली सीख को प्रस्तुत करेंगे।
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Sagar, Madhya Pradesh | Aug 27, 2026