वरिष्ठ पत्रकार विनोद मुसान की कलम से
दो मिनट की संक्षेप रीडिंग में समझिए हरक @ जेनी की पूरी कहानी....!!!!
उत्तराखंड की सियासत में 'जेनी केस' एक ऐसा रहस्यमयी अध्याय है, जिसकी पटकथा जब भी खत्म होती दिखती है, कुछ सालों बाद एक नए मोड़ के साथ फिर सामने आ जाती है। यह तीन दशकों में फैली एक ऐसी दास्तान है, जिसमें राजनीति, आरोप, वैज्ञानिक साक्ष्य और अचानक बदले बयानों के कई नाटकीय मोड़ शामिल हैं।
#पहलाअंक (2002-2004): आरोपों की शुरुआत और डीएनए की मुहर
कहानी शुरू होती है अक्टूबर 2002 के धुंधलके में, जब असम की इंदिरा देवड़ी (जिन्हें जेनी नाम से जाना गया) देहरादून पहुँचती हैं। देखते ही देखते, 15 जून 2003 को सरकारी अस्पताल के एक कमरे से यह मामला पूरे राज्य के सियासी गलियारों में तहलका मचा देता है। जेनी एक बेटे को जन्म देती हैं और तत्कालीन शक्तिशाली राजस्व मंत्री हरक सिंह रावत पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा करती हैं कि नौकरी का झांसा देकर उनसे शारीरिक संबंध बनाए गए।
यह मामला महज एक शिकायत नहीं रहता, बल्कि राज्य की राजनीति में भूचाल ला देता है। विधानसभा के भीतर और बाहर मचते हंगामे के बीच हरक सिंह रावत को अपना इस्तीफा देना पड़ता है। एन.डी. तिवारी की सरकार मामले को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के सुपुर्द कर देती है।
25 जुलाई 2003 को सीबीआई द्वारा प्राथमिकी दर्ज की जाती है। इस कानूनी नाटक का सबसे बड़ा निर्णायक मोड़ तब आता है, जब अदालत के निर्देश पर डीएनए (DNA) सैंपल लिए जाते हैं। जब प्रयोगशाला से रिपोर्ट बाहर आती है, तो वैज्ञानिक साक्ष्य की मुहर साफ होती है, बच्चे का डीएनए हरक सिंह रावत से मैच नहीं होता। सीबीआई की ओर से उन्हें क्लीन चिट मिल जाती है।
वर्ष 2004 में, पर्दा तब गिरता है जब जेनी स्वयं सार्वजनिक रूप से सामने आकर बयान देती हैं कि हरक सिंह रावत निर्दोष हैं, उन्होंने केवल सहायता की थी और पुराने आरोप दबाव में लगाए गए थे।
#दूसराअंक (2016): दिल्ली का साया और 96 घंटे का यू-टर्न
सालों की खामोशी के बाद, 29 जुलाई 2016 को इस कहानी का दूसरा अंक दिल्ली के सफदरजंग एन्क्लेव थाने से शुरू होता है। जेनी एक बार फिर पुलिस के दरवाजे पर पहुँचती हैं और उसी तरह के आरोपों के साथ एक नई प्राथमिकी दर्ज कराती हैं। उनका कहना होता है कि ग्रीन पार्क स्थित मकान में उनके साथ गलत हुआ।
लेकिन इस बार कहानी में ट्विस्ट बहुत तेजी से आता है। महज चार दिनों के भीतर—3 अगस्त 2016 को—जब साकेत कोर्ट के मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराने की बारी आती है, तो जेनी पूरी तरह मुकर जाती हैं।
अदालत के कमरे में वे बयान देती हैं कि आरोप झूठे थे, हरक सिंह रावत एक "अच्छे इंसान" हैं और वे उनसे माफी मांगती हैं। इसके साथ ही वे एक नया आरोप लगाती हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके सहयोगियों ने उन पर फर्जी केस कराने के लिए दबाव बनाया था। केस बिना किसी चार्जशीट के वहीं दम तोड़ देता है। बाद में जब जांच एजेंसियां उनके पते और मोबाइल नंबर की पड़ताल करती हैं, तो वे फर्जी निकलते हैं और जेनी अचानक गायब हो जाती हैं।
#तीसराअंक (2026): 23 साल बाद फिर वही सवाल
समय का पहिया घूमता है और 7 नवंबर 2026 को देहरादून की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से यह कहानी एक बार फिर जीवित हो उठती है। 23 साल पुराने मामले को लेकर जेनी दोबारा मीडिया के सामने आती हैं। इस बार वे नए विवरण जोड़ते हुए दावा करती हैं कि 2002 में वे नाबालिग (16 वर्ष) थीं और उन्हें यमुना कॉलोनी में रखा गया था।
वे अपने 23 साल के बेटे के हक के लिए एक बार फिर नए सिरे से डीएनए टेस्ट कराने और पुरानी सीबीआई जांच को दोबारा खोलने की मांग रखती हैं।
यवनिका के पीछे का रहस्य
जैसे किसी सस्पेंस फिल्म का अंत दर्शकों के मन में कई सवाल छोड़ जाता है, वैसे ही यह मामला कानूनी और तथ्यात्मक स्थिरता के लिहाज से कई यक्ष प्रश्न खड़े करता है।
जब 2016 में दिल्ली पुलिस की जांच चल रही थी और मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के बयान दर्ज हो रहे थे, तब "16 साल की उम्र" या "यमुना कॉलोनी" जैसे गंभीर विवरण और दोबारा डीएनए कराने की मांग क्यों नहीं रखी गई?
कानून की नजर में 2003 की सीबीआई जांच और डीएनए रिपोर्ट एक ठोस वैज्ञानिक आधार है। जब शिकायतकर्ता स्वयं 2004 और 2016 में दो बार आरोपों को वापस ले चुकी हों, तो 23 साल बाद वही मांगें कानूनी रूप से कितनी टिक पाती हैं?
यह मामला सिर्फ दो व्यक्तियों के बीच की कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि एक ऐसा सियासी चक्रव्यूह बन चुका है जहाँ हर कुछ वर्षों बाद वही कहानी नए दांव-पेचों के साथ दोहराई जाती है। न्याय का तकाजा कहता है कि हर दावे की निष्पक्ष जांच हो, लेकिन अतीत के दर्ज तथ्य और वैज्ञानिक रिपोर्ट इस दास्तान के सबसे मजबूत स्तंभ बने हुए हैं।
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