"परीक्षा या परीक्षा की परीक्षा?"
दिल्ली की सड़कों पर बैठे ये छात्र सिर्फ अपने भविष्य के लिए नहीं, बल्कि उस भरोसे के लिए लड़ रहे हैं जिसे हर प्रतियोगी परीक्षा के साथ जोड़ा जाता है।
जब लाखों युवा दिन-रात मेहनत करें, परिवार उम्मीदें बांधे बैठे हों और फिर पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आएं, तो सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर खड़ा हो जाता है।
ऐसे में कई लोग पूछ रहे हैं—अगर नैतिक जिम्मेदारी तय होती है, तो क्या शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए? वहीं दूसरी ओर सरकार का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास जारी हैं।
लेकिन प्रदर्शन कर रहे छात्रों की नजर में सबसे बड़ी कमी जवाबदेही की है। उन्हें लगता है कि आश्वासनों से ज्यादा जरूरी है ऐसा सिस्टम, जिसमें उनकी मेहनत सुरक्षित रहे।
व्यंग्य यही है कि देश में युवाओं को सबसे पहले "प्रतियोगी परीक्षा" नहीं, बल्कि "व्यवस्था की परीक्षा" पास करनी पड़ रही है।
अब फैसला जनता करे—क्या सिर्फ जांच और बयान काफी हैं, या नैतिक जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए?
आपकी राय क्या है? कमेंट में जरूर बताइए।
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Hisar, Hissar | Jul 23, 2026