जब Gen Z नहीं झुका, जब संविधान पर भरोसा नहीं टूटा… तब 36 दिनों के संघर्ष ने सत्ता को झुकने पर मजबूर कर दिया।
दिल्ली जंतर मंतर : दिनों का यह संघर्ष सिर्फ़ एक इस्तीफ़े की लड़ाई नहीं था, यह उन लाखों सपनों की लड़ाई थी जो एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था, निष्पक्ष परीक्षा और अपने भविष्य के लिए सड़क पर उतरे थे।
जब सोनम वांगचुक ने संविधान के दायरे में रहकर 26 दिनों तक आमरण अनशन किया, तब हज़ारों Gen Z युवाओं ने भी उम्मीद का हाथ थाम लिया। फिर वह दिन भी आया जब उन्हें धरना स्थल से हटाकर अस्पताल ले जाया गया। आंदोलन थमा नहीं, बल्कि और मज़बूत होता गया।
20 जुलाई का वह दिन कई लोगों के लिए कभी न भूलने वाला रहा। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई में कई छात्र घायल हुए, किसी के सिर पर चोट लगी, किसी के हाथ-पैर टूटे, कईयों की आँखों में आँसू थे। लेकिन उन आँसुओं से बड़ी उनकी उम्मीद थी—उम्मीद उस संविधान पर, जिसने अपनी बात शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से रखने का अधिकार दिया।
संघर्ष दिल्ली से निकलकर पूरे देश में पहुँचा। कई राज्यों में प्रदर्शन हुए, कई युवाओं को हिरासत में लिया गया, लेकिन आवाज़ दब नहीं सकी। और फिर 25 जुलाई को यह ख़बर आई कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया।
उस पल कई आँखें नम थीं… क्योंकि यह सिर्फ़ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष के बाद मिली एक ऐसी ख़ुशी थी जिसमें दर्द भी शामिल था और जीत भी।
मुख्यधारा के कई मीडिया संस्थानों ने इस आंदोलन को अलग-अलग नज़रिए से दिखाया। वहीं अनेक स्वतंत्र पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया मंचों ने अपनी समझ और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ज़मीनी तस्वीर लोगों तक पहुँचाने की कोशिश की। मैंने भी उन्हीं छोटी-सी कोशिशों में अपना योगदान दिया, ताकि जो देखा, उसे ईमानदारी से लोगों तक पहुँचा सकूँ।
ये जीत किसी एक चेहरे की नहीं, उन हर आँखों की है जो रोई भी थीं और फिर मुस्कुराईं भी।
ये जीत उन हर कदमों की है जो डगमगाए ज़रूर, मगर रुके कभी नहीं।
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