राम जन्मोत्सव के वर्णन से भक्तिमय हुआ श्रीराम कथा का तीसरा दिन
बाल लीलाओं और गुरु-शिष्य परंपरा के प्रसंगों से श्रद्धालुओं को मिली संस्कारों की प्रेरणा
भिवानी, 13 अक्टूबर। प्रभु श्रीराम का जन्म केवल अयोध्या में एक राजकुमार का अवतरण नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, करुणा, त्याग और मानवता की स्थापना का दिव्य संदेश है। भगवान श्रीराम का जीवन प्रत्येक व्यक्ति को सत्य के मार्ग पर चलने, अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करने और समाज में सद्भाव बनाए रखने की प्रेरणा देता है। यह विचार पूज्य संत श्री रामझूलन दास जी महाराज ने अखिल भारतीय श्री दादू सेवक समाज के तत्वावधान में स्थानीय राजश्री बैंक्वेट हॉल में आयोजित श्रीराम कथा के तीसरे दिन व्यक्त किए। कथा के दौरान प्रभु श्रीराम के जन्म, बाल लीलाओं तथा शिक्षा-दीक्षा के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया गया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। राम जन्म के प्रसंग पर कथा स्थल जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा और वातावरण भक्तिमय हो गया।
संत रामझूलन दास जी महाराज ने प्रभु श्रीराम के जन्म प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है और मानवता अपने आदर्शों से भटकने लगती है, तब धर्म और सत्य की स्थापना का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। भगवान श्रीराम का अवतरण धर्म की रक्षा, अधर्म के विनाश और मानव जीवन को आदर्श दिशा प्रदान करने के उद्देश्य से हुआ। उनका जीवन सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, व्यक्ति को सत्य, न्याय और सदाचार का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि वास्तविक महानता पद, प्रतिष्ठा या शक्ति में नहीं, बल्कि त्याग, विनम्रता, कर्तव्यनिष्ठा और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता में निहित है।
कथा के दौरान संत श्री ने प्रभु श्रीराम के बाल्यकाल की मनोहारी लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान का बाल स्वरूप वात्सल्य, प्रेम, सरलता और आनंद का प्रतीक है। बाल लीलाएं मनुष्य के अंतर्मन में भक्ति भाव जागृत करने के साथ जीवन में सहजता, निश्छलता और विनम्रता अपनाने की प्रेरणा देती हैं। प्रभु श्रीराम का अपने माता-पिता, भाइयों और परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति प्रेम तथा सम्मान पारिवारिक संस्कारों की महत्ता को दर्शाता है।
महाराज श्री ने कहा कि परिवार बच्चों की पहली पाठशाला होता है। बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता के व्यवहार, पारिवारिक वातावरण और संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आज के समय में बच्चों को आधुनिक शिक्षा और तकनीकी ज्ञान प्रदान करने के साथ धार्मिक, नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों से जोड़ना भी आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है, जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझें तथा दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनें।
प्रभु श्रीराम की शिक्षा-दीक्षा के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए संत रामझूलन दास जी महाराज ने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, क्योंकि गुरु शिष्य को केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि उसके व्यक्तित्व का निर्माण कर उसे सही और गलत के बीच अंतर समझने की दृष्टि भी प्रदान करते हैं। गुरु का मार्गदर्शन जीवन में अनुशासन, धैर्य, विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा विकसित करने में सहायक होता है।
उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम ने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, आज्ञाकारिता और अनुशासन का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह आज भी विद्यार्थियों के लिए प्रासंगिक है। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे अपने शिक्षकों का सम्मान करें, ज्ञान प्राप्त करने के प्रति समर्पित रहें और अपने आचरण में अच्छे संस्कारों को स्थान दें। ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब उसका उपयोग व्यक्ति के स्वयं के विकास के साथ समाज के कल्याण के लिए भी किया जाए।
संत श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि श्रीराम कथा को केवल धार्मिक आयोजन अथवा श्रवण तक सीमित न रखें, बल्कि इससे प्राप्त शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में भी अपनाएं। माता-पिता का सम्मान, बड़ों के प्रति आदर, छोटों के प्रति स्नेह, जरूरतमंदों की सहायता, सत्य का पालन और समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन ही प्रभु श्रीराम के आदर्शों को आत्मसात करने का वास्तविक मार्ग है।
उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में मर्यादा, ईमानदारी, सेवा और सद्भाव को महत्व दे, तो परिवारों में प्रेम बढ़ेगा और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण होगा। प्रभु श्रीराम का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर कर्तव्य और लोककल्याण को महत्व देना चाहिए। श्रीराम कथा के तीसरे दिन राम जन्म, बाल लीलाओं और शिक्षा-दीक्षा के प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भक्ति के साथ-साथ जीवनोपयोगी संस्कारों का संदेश दिया। कथा के दौरान श्रद्धालु भक्तिभाव से सराबोर दिखाई दिए। इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्रीराम कथा का श्रवण कर धर्म, मर्यादा, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त की।
इस मौके पर अखिल भारतीय श्री दादूसेवक समाज के अध्यक्ष अशोक बुवानीवाला, सुशील बवानी वाला, राधेश्याम बुवानी वाला, मीनू बवानी वाला, नंद किशोर अग्रवाल, प्रवीण गोयल,ओपी नन्दवानी,जवाहर मिताथलिया,दीवानचंद रहेजा,पार्षद विनोद प्रजापति,गजानन्द सरपंच,सजन एडवोकेट, ललित बुवानीवाला, जयप्रकाश मामुक़ा, सुरेश देवरालिया,प्रदीप पालमपुरिया,
सुनील शास्त्री, दीपक अग्रवाल तौला, केशरी शर्मा, महेश जुई वाले,प्रिया असीजा,धर्मेंद्र जिंदल,नवीन गुप्ता,धर्मेंद्र यादव,
एसके लेखा, आशीष अग्रवाल सहित अनेक श्रद्धालु एवं गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।