क्या गरीब की जान की कोई कीमत नहीं? या फिर प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?
कलुआखेड़ी गांव में पिछले साल बारिश ने कई गरीब परिवारों के कच्चे घर उजाड़ दिए थे। उस समय अधिकारियों ने भरोसा दिया था कि इन्हें आवास योजना का लाभ मिलेगा और सिर पर पक्की छत होगी। लेकिन एक साल बाद भी हालात जस के तस हैं।आज भी ये परिवार उन्हीं जर्जर और छतिग्रस्त घरों पर तिरपाल डालकर जिंदगी काट रहे हैं। हर बारिश इनके लिए डर बनकर आती है। गांव में सीसी सड़क तक नहीं है, जिसकी मांग भी लगातार की जा रही है, लेकिन विकास आज तक यहां नहीं पहुंच पाया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन गरीबों की सुनवाई क्यों नहीं हो रही? क्या योजनाएं सिर्फ फाइलों और भाषणों तक सीमित हैं? क्या किसी मासूम की जान जाने के बाद ही प्रशासन जागेगा? अगर आने वाले समय में छतिग्रस्त कच्चे घरों की कोई दीवार गिरती है या कोई परिवार हादसे का शिकार होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
गरीबों को सिर्फ आश्वासन नही�