जगाधरी, हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया जिसके दौरान परम पूजनीय दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सरस्वती भारती जी ने गुरु कृपा का महत्व समझाते हुए कहा कि गुरु कृपा परमात्मा और प्रकृति के द्वारा दिया गया वह वरदान है जो हमें इस लोक व परलोक में अति दुर्लभ वस्तु को भी सुलभ बना सकता है। गुरु कृपा तो मनुष्य को वह भी प्रदान कर सकती है जो कदाचित उसके भाग्य में नहीं है क्योंकि गुरु कृपा का दायरा असीमित है। सांसारिक सुख एवं आध्यात्मिक उन्नति के साथ शक्ति भक्ति और मुक्ति तीनों के प्रदाता गुरु हैं। गुरु की कृपा शिष्य को वह सब कुछ प्रदान कर सकती है जो वह अपने पुरुषार्थ से कई जन्मों तक भी प्राप्त नहीं कर सकता। परन्तु यहाँ प्रश्न उठता है कि गुरु कृपा कैसे मिलती है और कब मिलती है, इसके लिए सर्वप्रथम हमें गुरु को समझना होगा। मनुष्य की जिज्ञासा, प्रार्थना एवं पूर्व जन्म कि पुण्यों के अनुसार ही उसे गुरु प्राप्त होता है। भगवान शिव व माता पार्वती का संवाद, गुरु गीता में सूचक, वाचक, बोधक, निषिद्ध, विहित, कारण तथा परम गुरु यह सात प्रकार के गुरु बताए गए हैं। इनमें से परम गुरु ही वे ब्रह्मनिष्ठ भगवान के साकार स्वरूप हैं जिनका सामर्थ्य असीम है। कई जन्मों के पुण्य व आत्मा की गहन पुकार ही ऐसे परम गुरु को हमारे जीवन में लेकर आती है परन्तु गुरु की कृपा मिलना सरल नहीं है। परमात्मा की कृपा हमारे भाग्य के अनुसार ही हमें उपलब्धियाँ प्रदान करती है किन्तु गुरु कृपा तो हमारे जीवन में वह भी सब कुछ दिला सकती है जो हमारे भाग्य में भी नहीं था। ऐसे दिव्य परम गुरु की कृपा केवल उसे ही प्राप्त होती है जो मिथ्या अहंकार त्याग कर गुरु की शरणागति होता है और निरंतर ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना के द्वारा आत्म साक्षात्कार कर गुरु की आज्ञा अनुसार ही जीवन यापन करता है। गुरु की दृष्टि परोक्ष है और वे अपनी शिष्य के भूत भविष्य वर्तमान से भलीभाँति परिचित होते हैं। जब गुरु अपने शिष्य के लिए कोई निर्णय लेते हैं तो वह अत्यंत कल्याणकारी होता है। शिष्य को चाहिए कि ऐसे दिव्य परम गुरु के मिलने पर अपने मन वचन कर्म से उनके आदर्शों को जीवन में उतारे और गुरु की आज्ञा अनुसार भक्ति पथ का अनुसरण करता रहे क्योंकि गुरु अपने शिष्य को कभी संसार का त्याग करने के लिए नहीं कहते अपितु वे तो उसे आध्यात्मिक जागृति के द्वारा जीवन जीने की कला सिखाते हैं और जीवन में विपरीत परिस्थितियाँ आने पर उसे आग के दरिया से भी हाथ पकड़कर बचा लेते हैं। परम गुरु वे हैं जो शिष्य के कई जन्मों के कर्म संस्कारों को क्षण भर में काट देते हैं और उसे जीवन मुक्ति का आनंद प्रदान करते हैं। सामूहिक ध्यान साधना और विश्व शांति की प्रार्थना के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।
Ambala, Ambala | Jun 7, 2026