बांदा में मुहर्रम की 5वीं तारीख की रात का विशेष धार्मिक और पारंपरिक महत्व है। इस रात शहर के विभिन्न इमामबाड़ों और मोहल्लों में मजलिसें आयोजित होती हैं, जिनमें इमाम हुसैन (अ.स.) और कर्बला के शहीदों की याद में मर्सिया, नौहा और मातम किया जाता है।
बांदा की प्रमुख परंपरा – ढाल सवारियों का मिलाप
बांदा में 5वीं मुहर्रम की रात निकलने वाली ढाल सवारियों (अलम/ताज़ियों) का मिलाप एक ऐतिहासिक और प्रसिद्ध परंपरा मानी जाती है। इस दौरान:
शहर के अलग-अलग मोहल्लों और इमामबाड़ों से ढाल सवारियां और अलम जुलूस की शक्ल में निकलते हैं।
अजादार नौहाख्वानी और मातम करते हुए निर्धारित स्थान पर पहुंचते हैं।
विभिन्न अंजुमनों और अखाड़ों की सवारियों का मिलाप होता है, जो आपसी भाईचारे, एकता और इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रति अकीदत का प्रतीक माना जाता है।
बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और आसपास के क्षेत्रों से आए श्रद्धालु इस परंपरा को देखने और उसमें शामिल होने पहुंचते हैं।
यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ बांदा की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुहर्रम के दौरान शहर में सुरक्षा और यातायात की विशेष व्यवस्था भी की जाती है।
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Banda, Banda | Jun 23, 2026