चकाचौंध वाली दिवाली में फीकी पड़ रही कुम्हारों की चमक, मिट्टी के दीयों का कारोबार सिमटा
चाइनीज लाइट ने छीना रोजगार, कभी दीये-बर्तन बेचकर चलता था परिवार, अब लागत निकालना भी मुश्किल
दीपावली रोशनी का पर्व है। इस पर्व पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। दीया, बाती और तेल के संगम से घर-आंगन रोशन होते थे, लेकिन बदलते दौर में चकाचौंध वाली दिवाली ने कुम्हारों के जीवन से रौनक छीन ली है। बाजार में चाइनीज लाइट और बिजली के सजावटी सामान की बढ़ती मांग के कारण मिट्टी के दीयों का कारोबार लगातार सिमटता जा रहा है। इसका सीधा असर कुम्हार परिवारों के रोजगार और आमदनी पर पड़ रहा है।
अमोना गांव के प्रताप पंडित बताते हैं कि पहले दीपावली के मौके पर दीये और मिट्टी के बर्तन बेचकर अच्छी कमाई हो जाती थी। इसी कमाई से बेटी की शादी और बच्चों की पढ़ाई तक का खर्च निकल जाता था। करीब 20 साल पहले भी एक रुपये में दीया बिकता था। उस समय मिट्टी का एक ट्रैक्टर लगभग 50 रुपये में मिल जाता था, जबकि अब मिट्टी की कीमत करीब 2500 रुपये हो गई है। इसके बावजूद दीये की कीमत में खास बढ़ोतरी नहीं हुई। उन्होंने कहा कि चाइनीज लाइट ने हमारे पेट पर लात मार दी है।
शंकर पंडित कहते हैं कि कुम्हार समाज के सामने अब रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। वहीं ललिता देवी और सबरी देवी बताती हैं कि पहले घर के पुरुष मिट्टी लाते थे और महिलाएं मिलकर दीये व बर्तन बनाती थीं। पूरे परिवार की मेहनत से अच्छा कारोबार होता था, लेकिन अब काम घटने से महिलाएं भी बेरोजगार हो गई हैं।
बलराम पंडित और रामानंद पंडित का कहना है कि सरकार को मिट्टी के दीये और बर्तनों के कारोबार को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजना बनानी चाहिए। इससे पारंपरिक कला भी बचेगी और कुम्हार परिवारों को रोजगार भी मिल सकेगा।
Araria, Araria | Nov 6, 2026