चौमासे के जनजातीय एवं लोक अनुष्ठानों पर दो दिवसीय परिसंवाद
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जनजातीय परंपराओं के संरक्षण और दस्तावेजीकरण पर विशेषज्ञ एवं शोधार्थियों ने रखे विचार
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कोरकू एवं निमाड़ अंचल की समृद्ध जनजातीय एवं लोक परंपराओं, अनुष्ठानों तथा उनसे जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियों को समझने और संरक्षित करने के उद्देश्य से माखनलाल चतुर्वेदी शासकीय स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, खंडवा के सभागार में दो दिवसीय परिसंवाद का आयोजन किया गया। परिसंवाद का केंद्रीय विषय “चौमासे के जनजातीय एवं लोक अनुष्ठान : सांस्कृतिक स्मृति और अभिप्राय” रहा।
इस दो दिवसीय आयोजन के पहले दिन शुक्रवार को विशेष रूप से कोरकू एवं निमाड़ अंचल की लोक-सांस्कृतिक परंपराओं, चौमासे से जुड़े अनुष्ठानों, लोकगीतों, लोकनृत्यों, आस्था एवं सामुदायिक जीवन पर केंद्रित विमर्श हुआ। आयोजन जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद द्वारा तथा माखनलाल चतुर्वेदी शासकीय स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, खंडवा के सहयोग से किया गया।
*लोक अनुष्ठानों के सांस्कृतिक अभिप्राय पर हुआ गहन विमर्श*
परिसंवाद की जानकारी देते हुए डॉ. धर्मेंद्र पारे, निदेशक, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी ने कहा कि आयोजन का उद्देश्य चौमासे के दौरान प्रचलित लोक-अनुष्ठानों और परंपराओं के पीछे निहित सांस्कृतिक अर्थों को समझना तथा उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक अभिप्राय पर गंभीर विमर्श करना है। बदलते सामाजिक परिवेश में अनेक पारंपरिक अनुष्ठान और लोकाचार धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे में इन परंपराओं का अध्ययन, मौखिक इतिहास का संकलन और उनका दस्तावेजीकरण सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है । डॉ. पारे ने बताया कि कोरकू एवं निमाड़ अंचल की सांस्कृतिक परंपराओं में प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरा एवं आत्मीय संबंध दिखाई देता है। वर्षा, कृषि, जल, जंगल और भूमि से जुड़े लोकविश्वासों ने यहां के सामुदायिक जीवन को लंबे समय से प्रभावित किया है। चौमासे के दौरान होने वाले विभिन्न अनुष्ठान और लोकाचार स्थानीय समाज के जीवन-चक्र, कृषि गतिविधियों, प्रकृति के प्रति आस्था तथा सामुदायिक संबंधों से जुड़े रहे हैं।
परिसंवाद में जनजातीय एवं लोक परंपराओं पर शोध कर रहे अध्येताओं, विशेषज्ञों, कलाकारों एवं विषय के जानकारों ने सहभागिता करते हुए अपने विचार प्रस्तुत किए।
श्री मनीराम सुथार ने विशेष व्याख्यान में कहा कि कोरकू धरती के बहुत पुराने वासी हैं, उन्हें रावण का वंशज कहना पूरी तरह ग़लत है, हमारे आदि पुरुष और आदिमाता मूला मुलाई है।
पारंपरिक लोकगीतों, लोकनृत्यों एवं अनुष्ठानों की प्रस्तुतियों के माध्यम से इन परंपराओं के जीवंत स्वरूप को समझने का कार्य श्री लालजी साल्वे ने किया। श्री गोपाल कोरकू ने बिदरी और भवाई तथा नवान्न पूजा का प्रदर्शन किया।श्री पांडुरंग बीबोलकर ने कोरकू अनुष्ठानिक सामग्रियों और पारिस्थितिक ज्ञान को प्रस्तुत किया।
महाविद्यालय के प्राचार्य श्री विनय जैन ने कहा कि यह परिसंवाद केवल परंपराओं के प्रदर्शन तक सीमित न रहकर उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदर्भों को समझने का प्रयास है। इसका उद्देश्य जनजातीय एवं लोक संस्कृति की मौखिक परंपराओं को संकलित कर भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना तथा इनके संरक्षण और दस्तावेजीकरण की दिशा में सार्थक पहल करना है।
*वंशावलियों में दर्ज है कोरकू परंपराओं का इतिहास*
आज के सत्र की अध्यक्षता कर रहे श्री उमेश पाठक ने अपने उद्बोधन में कहा कि सूकर क्षेत्र में कोरकू समुदाय के गोत्रों द्वारा पिंडदान किए जाने की जानकारी वंशावलियों में लिपिबद्ध है। उन्होंने कहा कि वंशावलियां केवल पारिवारिक इतिहास का दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि इनके माध्यम से समुदाय की सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को भी समझा जा सकता है। वक्ता श्रीकृष्ण काकड़े ने कहा कि कोरकू जनजाति का जीवन प्रकृति के इर्द-गिर्द घूमता है। उनके बारहमासा पर्व, त्योहार और अनुष्ठान प्रकृति के प्रति समर्पित हैं। इन परंपराओं में सामुदायिक भावना के साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
*अनुष्ठान के बाद प्रस्तुत हुआ पारंपरिक कोरकू नृत्य*
परिसंवाद में कोरकू दल द्वारा पारंपरिक नृत्य की प्रस्तुति से पूर्व भवाई अनुष्ठान किया गया। ग्रामदेवताओं एवं बीज की पूजा-अर्चना के पश्चात् कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा और लोकवाद्यों के साथ नृत्य प्रस्तुत किया। प्रस्तुति में कोरकू समुदाय की आस्था, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक जीवन की जीवंत झलक देखने को मिली।
लोकगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति ने परिसंवाद के अकादमिक विमर्श को लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्तियों से जोड़ा। उपस्थित विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं संस्कृति-प्रेमियों ने प्रस्तुतियों को रुचि के साथ देखा और जनजातीय परंपराओं के विविध पक्षों को समझा।सुश्री अश्विनी सोनी और प्रो कन्हैयालाल सोलंकी ने शोध पत्र वाचन किया । संचालन प्रो मीना जैन और डा तरुण दागौड़े ने किया।
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Khandwa, Madhya Pradesh | Aug 21, 2026