एक वचन की खातिर सदियों से घुमक्कड़, पर नहीं भूले अपनी संस्कृति
एक प्राचीन वचन को निभाने के लिए #राजस्थान के #लौहरगडिया समाज आज भी घुमक्कड़ जीवन जी रहा है। अपनी मातृभूमि से दूर, दर-दर भटकने के बाद भी इस समाज ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं को मजबूती से थाम रखा है। आधुनिकता के इस दौर में भी यह समाज गाँव-गाँव घूमकर लोहे के कृषि संबंधी औजारों और हथियारों का निर्माण कर रहा है।
राहतगढ़ क्षेत्र के बेरखेड़ी सड़क इलाके में इन दिनों इस समाज के कई परिवार डेरा डाले हुए हैं। अमूमन बरसात के दिनों में यह लोग यहाँ रुकते हैं। अपनी आजीविका के लिए दिन-भर कड़ी मेहनत करने वाले ये लोग अपनी धार्मिक आस्था को लेकर भी उतने ही सजग हैं।
कठिन परिस्थितियों में रहने के बावजूद इस समाज की आस्था अडिग है। बेरखेड़ी सड़क पर रुके इन परिवारों द्वारा हर वर्ष नवरात्रि के अवसर पर माता के ज्वारे (जवारे) बोए जाते हैं। पूरे नौ दिनों तक बेहद नियम और शुद्धता के साथ माता दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है।
नवरात्रि के नौवें दिन (महानवमी) पर इस समाज में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। इस वर्ष भी नवें दिन पूरे परंपरागत अंदाज में, गाजे-बाजे और नृत्य के साथ धूमधाम से ज्वारे विसर्जन की यात्रा निकाली गई। अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सजे समाज के लोगों ने माता के जयकारों के साथ ज्वारे का विसर्जन किया।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि हर साल इस घुमक्कड़ समाज का यह रूप देखना अपने आप में अनूठा होता है। महलों और पक्के मकानों का त्याग कर सिर्फ एक वचन के लिए तंबू और गाड़ियों में जिंदगी गुजारने वाले इन लोगों की अपनी संस्कृति के प्रति यह निष्ठा वाकई अनुकरणीय है।
(फोटो सुनील सिंह ठाकुर)