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बालाघाट में खेती का नया स्वरूप: धान की जगह अमरूद और अंतर्वर्ती फसलों से राजेन्द्र पंचेश्वर ने लिखी सफलता की इबारत
धान के कटोरे के रूप में मशहूर बालाघाट जिले में अब किसान नई तकनीक और विविधता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। लालबर्रा विकासखंड के ग्राम अमोली के प्रगतिशील किसान राजेन्द्र पंचेश्वर ने अपनी पारंपरिक खेती में एक साहसिक नवाचार करते हुए धान की जगह बागवानी और मिश्रित खेती का रुख किया है, जो पूरे जिले के किसानों के लिए एक नजीर बन गया है।
धान की लकीर से हटकर एक नई शुरुआत
राजेन्द्र पंचेश्वर ने अपनी एक एकड़ जमीन पर धान की पारंपरिक खेती को छोड़कर अमरूद (Guava) के पौधे रोपे हैं। केवल अमरूद तक ही सीमित न रहकर, उन्होंने 'मल्टी-लेयर' या अंतर्वर्ती फसल प्रणाली का अनूठा उदाहरण पेश किया है। उन्होंने अमरूद के पौधों के बीच खाली जगह का उपयोग अदरक और अरहर की खेती के लिए किया है।
इस नवाचार को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए अब उन्हें अदरक, अरहर और अमरूद के पौधों के बीच की खाली जगह पर मक्का की फसल लगाने की भी सलाह दी गई है, जिससे खेत की हर इंच भूमि उपयोग में आ सके और किसान की आय बढ़ सके।
कृषि विभाग का साथ और मार्गदर्शन
इस नवाचार को सफल बनाने में कृषि विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उप संचालक कृषि, श्री फूलसिंह मालवीय ने बताया कि लालबर्रा की वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी की टीम लगातार राजेन्द्र पंचेश्वर के संपर्क में है। उन्हें अंतर्वर्ती फसलों (Intercropping) के बेहतर प्रबंधन और उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक मार्गदर्शन दिया जा रहा है।
इस मॉडल के तीन बड़े फायदे
राजेन्द्र पंचेश्वर का यह प्रयोग न केवल आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद है, बल्कि पर्यावरण और संसाधन प्रबंधन के लिहाज से भी बेहतरीन है। इससे पानी की बचत होगी।धान की फसल में प्रचुर मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जबकि अमरूद, अदरक और अरहर की खेती में धान की तुलना में काफी कम पानी लगता है। इससे आय में वृद्धि होगी। एक ही खेत से अमरूद (फल), अदरक (मसाला) और अरहर/मक्का (दाल/अनाज) मिलने से किसान की आय के स्रोत बढ़ गए हैं। यह मॉडल धान की एकल खेती की तुलना में कहीं अधिक मुनाफा देने वाला है। इससे मिट्टी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।अलग-अलग तरह की फसलें लेने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और रसायनों पर निर्भरता कम होती है।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणा
ग्राम अमोली के राजेन्द्र पंचेश्वर का यह प्रयास यह साबित करता है कि यदि किसान सही मार्गदर्शन के साथ नई तकनीक अपनाए, तो खेती को घाटे का सौदा नहीं, बल्कि एक लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है। बालाघाट के अन्य किसान भी अब इस 'अमोली मॉडल' को देखकर अपनी खेती की दिशा बदलने पर विचार कर रहे हैं।
यह नवाचार न केवल राजेन्द्र पंचेश्वर की तकदीर बदलेगा, बल्कि बालाघाट की कृषि को एक नई और आधुनिक पहचान दिलाने में भी मदद करेगा।
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59 views | Balaghat, Madhya Pradesh | Jul 11, 2026