सातूँ-आठूँ (सातू-आठू) कुमाऊँ का बहुत महत्वपूर्ण लोकपर्व है, जिसे गौरा-महेश, गमरा पर्व या गौरा महेश्वर पर्व भी कहा जाता है। इसका विशेष संबंध पिथौरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर और कुमाऊँ के सीमांत क्षेत्रों के साथ-साथ पश्चिमी नेपाल की संस्कृति से है।
इस पर्व में गौरा यानी माता पार्वती और महेश यानी भगवान शिव को केंद्र में रखा जाता है। कुमाऊँ की लोकमान्यता में गौरा को घर की बेटी/दीदी और महेश को जीजा/भिनज्यू के रूप में देखा जाता है।
लोककथा के अनुसार, गौरा अपने पति महेश से नाराज होकर मायके आ जाती हैं। इसके बाद महेश उन्हें वापस अपने साथ ले जाने के लिए मायके आते हैं। इसी भाव को कुमाऊँ के लोग अपने पारिवारिक रिश्तों से जोड़कर मनाते हैं—गौरा की मायके में आवभगत, महेश का स्वागत और अंत में गौरा की विदाई।
सातूँ-आठूँ की शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पंचमी, जिसे बिरुड़ पंचमी कहते हैं, से होती है।
इस दिन घर में अलग-अलग अनाज जैसे गेहूँ, चना, गहत, मटर, उड़द, मक्का आदि को भिगो
Pithoragarh, Pithoragarh | Aug 17, 2026