‘मुझे 2027 का चुनाव लड़ना है’: हत्या के दोषी की दलील पर हाईकोर्ट ने रोकी उम्रकैद, मिली जमानत; क्या राजनीति अब नई ‘संजीवनी’ है?
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प्रयागराज / लखनऊ:
उत्तर प्रदेश की सियासत और न्याय प्रणाली के गलियारों से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने कानून के जानकारों से लेकर आम अवाम तक को हैरत में डाल दिया है। 2017 के चर्चित प्रमोद कुमार निगम हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी नंदलाल राय उर्फ बबलू राय को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिल गई है। हाईकोर्ट ने अपील लंबित रहने तक राय की दोषसिद्धि (Conviction) और आजीवन कारावास की सजा (Sentence) दोनों पर रोक लगाते हुए उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
राहत का यह दरवाजा तब खुला जब दोषी के वकीलों ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल वर्ष 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं—निर्दलीय या मुमकिन हुआ तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर!
अदालत का फैसला और पीठ का विवरण
* न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (प्रयागराज पीठ)
* पीठ: न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ
* आदेश की तिथि: अक्टूबर 2026 (अपील लंबित रहने के दौरान पारित अंतरिम आदेश)
* निचली अदालत का फैसला: वाराणसी की विशेष अदालत (न्यायाधीश यदुवेंद्र विक्रम सिंह) ने 15 अप्रैल 2025 को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत नंदलाल राय को उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अदालत की दलील और कानूनी टिप्पणी
अदालत ने अपने तीन पन्नों के आदेश में उच्चतम न्यायालय की नज़ीरों का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि अपील पर अंतिम निर्णय आने तक किसी नागरिक की आजीविका और अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया:
“एक आम नागरिक की आजीविका का अधिकार किसी राजनेता के चुनाव लड़ने के अधिकार से कम महत्वपूर्ण नहीं है। अपील के अंतिम निपटारे तक अपीलकर्ता को जीवित रहने और अवसर पाने की दृष्टि से राहत दिया जाना न्यायोचित है।”
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(3) के अनुसार, दो साल या उससे अधिक की सजा पाने वाला व्यक्ति चुनाव लड़ने से अयोग्य हो जाता है। परंतु यदि उच्च अपीलीय अदालत दोषसिद्धि (कनविक्शन) पर ही रोक लगा दे, तो यह अयोग्यता स्वतः निष्प्रभावी हो जाती है। अदालत ने राय को सशर्त जमानत देते हुए निर्देश दिया कि वह बिना अनुमति अपनी अचल संपत्ति नहीं बेचेंगे और एक माह में जुर्माने की 50% राशि जमा करेंगे।
क्या था मामला? (निगम हत्याकांड की पृष्ठभूमि)
* घटना: 17 जनवरी 2017 की रात वाराणसी के सिगरा थाना क्षेत्र स्थित इंग्लिशिया लाइन के पास फेरी-पटरी ठेला व्यवसायी संघ के अध्यक्ष और राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े कारसेवक प्रमोद कुमार निगम की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
* विवाद की वजह: पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, नंदलाल राय शराब/बीयर पीने के बाद सड़क पर खुले में पेशाब कर रहा था। नगर निगम के स्वच्छता दूत प्रमोद निगम ने जब उसे टोका तो दोनों में कहासुनी और हाथापाई हुई। अपमान का बदला लेने के लिए राय ने अपने साथी के साथ मिलकर निगम की गोली मारकर हत्या कर दी थी।
* अन्य कनेक्शन: नंदलाल राय का नाम पूर्व में 2005 के विधायक कृष्णानंद राय हत्याकांड के गवाह के तौर पर भी जुड़ा था (जहाँ वे बाद में मुकर गए थे) और उनका संबंध दिवंगत मुख्तार अंसारी से भी बताया जाता रहा है।
कानून के दायरे में व्यंग्य: ‘चुनाव लड़ने की तमन्ना और खाकी-काली वर्दी का संगम’
भारतीय राजनीति और कानून की यह जुगलबंदी भी गजब है! जहाँ एक आम मुजरिम जेल की सलाखों के पीछे ‘अच्छे आचरण’ या ‘बीमारी’ के पर्चे बनवाकर भी पेरोल के लिए तरस जाता है, वहीं राजनीति का पर्चा भरते ही किस्मत के सितारे गर्दिश से निकलकर सीधे चुनावी समर में चमकने लगते हैं।
अदालत का यह कहना सैद्धांतिक रूप से बिल्कुल सही है कि “चुनाव लड़ना भी आजीविका कमाने जैसा ही अधिकार है।” मगर व्यंग्य यह है कि आम बेरोजगार युवा रोज़गार दफ्तरों के चक्कर काटकर चप्पलें घिस देता है, लेकिन उसकी आजीविका का संकट शायद ही कभी 'सजा-मुक्ति' का कारण बन पाए। यहाँ संदेश बड़ा साफ और दिलचस्प है—यदि उम्रकैद की सलाखों में दम घुट रहा हो, तो एक हलफनामा दाखिल कीजिए कि ‘माई लॉर्ड, देश सेवा के लिए विधानसभा जाना है, टिकट चाहे निर्दलीय मिले या किसी पार्टी का!’ लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का रास्ता कई बार जेल के पिछले दरवाजे को भी खोल देता है।
वर्तमान स्थिति
हाईकोर्ट के इस आदेश का अर्थ यह कतई नहीं है कि नंदलाल राय हत्या के आरोप से बरी हो गए हैं। उनके खिलाफ वाराणसी अदालत के फैसले पर मुख्य अपील अभी भी हाईकोर्ट में विचाराधीन है। फिलहाल के लिए उन्हें सिर्फ ‘अंतरिम सांस’ मिली है, ताकि 2027 की चुनावी चौसर पर वे अपने भाग्य की बिसात बिछा सकें।