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Solan, Solan | Apr 19, 2026

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स्वास्थ्य व्यवस्था आईसीयू में, सरकार केवल उद्घाटन और प्रचार में व्यस्त — शैलेन्द्र

भारतीय जनता पार्टी सोलन शहरी मंडल के अध्यक्ष शैलेन्द्र  ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। सरकार नए अस्पतालों की इमारतों, उद्घाटनों और फीते काटने को अपनी उपलब्धि बताने में व्यस्त है, जबकि धरातल पर मरीज डॉक्टरों, विशेषज्ञ चिकित्सकों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। अस्पतालों की असली पहचान उनकी इमारतों से नहीं, बल्कि वहां उपलब्ध गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाओं से होती है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 में नीति आयोग एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की स्वास्थ्य रैंकिंग में हिमाचल प्रदेश "फ्रंट रनर" राज्यों में शामिल था, लेकिन वर्ष 2026 तक प्रदेश कई पायदान नीचे खिसक गया है और अब राष्ट्रीय मानकों तक पहुंचने के लिए भी संघर्ष कर रहा है। यह गिरावट वर्तमान सरकार की स्वास्थ्य क्षेत्र में विफल नीतियों का परिणाम है।

शैलेन्द्र  ने कहा कि पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में प्रदेश के बजट का लगभग 6.7 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च किया जाता था। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश को बिलासपुर में एम्स (AIIMS) जैसा विश्वस्तरीय संस्थान मिला, जिससे प्रदेश के लाखों लोगों को आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हुईं। इसके साथ ही शिमला के चामियाना में अटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशियलिटीज़ (AIMSS) और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार भी भाजपा सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि रही।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में हिमाचल प्रदेश को स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए ₹1,454 करोड़ की अतिरिक्त वित्तीय सहायता भी प्रदान की, लेकिन इसके बावजूद प्रदेश के अस्पतालों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की भारी कमी बनी हुई है। सरकार को जनता को बताना चाहिए कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं दिखाई दे रहा।

शैलेन्द्र गुप्ता ने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने सरकार के सभी दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार चंबा सहित अनेक जिलों में डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ के बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं। प्रदेश के अधिकांश CHC और PHC विशेषज्ञ डॉक्टरों के बिना चल रहे हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों की जनता सबसे अधिक प्रभावित हो रही है।

उन्होंने कहा कि सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि प्रदेश के कई अस्पतालों में गायनेकोलॉजिस्ट के बिना हजारों प्रसव कराए गए। कंडाघाट के सिविल अस्पताल में भी स्त्री रोग विशेषज्ञ की अनुपस्थिति के बावजूद 179 प्रसव कराए गए, जो माताओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ है। सरकार को बताना चाहिए कि विशेषज्ञ डॉक्टरों के बिना इस प्रकार की सेवाएं कैसे संचालित होती रहीं।

शैलेन्द्र  ने कहा कि करोड़ों रुपये खर्च कर एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और अन्य आधुनिक मशीनें तो खरीद ली गईं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए रेडियोग्राफर और तकनीकी स्टाफ की नियुक्ति नहीं की गई। परिणामस्वरूप कई अस्पतालों में ये मशीनें वर्षों से धूल फांक रही हैं और मरीजों को निजी अस्पतालों में महंगा इलाज करवाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि सोलन जिला अस्पताल में योग्य और अनुभवी डॉक्टरों की अच्छी टीम होने के बावजूद अस्पताल का प्रबंधन पूरी तरह अव्यवस्थित दिखाई देता है। मरीजों और उनके तीमारदारों को इलाज से अधिक व्यवस्थाओं की मार झेलनी पड़ रही है।

उन्होंने कहा कि एक मरीज को डॉक्टर से मात्र पांच मिनट परामर्श लेने के लिए कई-कई घंटे अस्पताल में संघर्ष करना पड़ता है। पहले पर्ची के लिए लाइन, फिर जांच लिखवाने के लिए लाइन, उसके बाद टेस्ट करवाने के लिए लाइन, फिर शुल्क जमा करवाने के लिए अलग लाइन और अंत में रिपोर्ट लेकर दोबारा डॉक्टर को दिखाने के लिए फिर घंटों इंतजार करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था में मरीज की हालत क्या होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जब एक स्वस्थ व्यक्ति भी घंटों लाइन में लगकर थक जाता है, तो गंभीर मरीज, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और दिव्यांग किस पीड़ा से गुजरते होंगे।

शैलेन्द्र  ने कहा कि प्रदेश के जिला अस्पताल आज उपचार केंद्र कम और रेफरल सेंटर अधिक बनते जा रहे हैं। शिमला, धर्मशाला, हमीरपुर, सिरमौर, कुल्लू और सोलन सहित अनेक अस्पतालों से मरीजों को विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव में आईजीएमसी शिमला और टांडा मेडिकल कॉलेज रेफर किया जा रहा है। इससे मरीजों का समय, पैसा और कई बार उनका जीवन भी खतरे में पड़ जाता है।

उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की कि स्वास्थ्य विभाग में रिक्त पड़े सभी डॉक्टरों, सुपर स्पेशलिस्ट, नर्सों, तकनीकी कर्मचारियों और पैरामेडिकल स्टाफ के पदों को तत्काल भरा जाए। जिला अस्पतालों की प्रबंधन व्यवस्था को आधुनिक और जवाबदेह बनाया जाए, ताकि मरीजों को घंटों लाइन में खड़े रहने की बजाय समय पर उपचार मिल सके।

अंत में शैलेन्द्र गुप्ता ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की जनता को अब विज्ञापन, उद्घाटन और झूठे दावों की नहीं, बल्कि समय पर इलाज, विशेषज्ञ डॉक्टर और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है। स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता के जीवन से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है। सरकार को प्रचार छोड़कर अस्पतालों की वास्तविक स्थिति सुधारने पर तुरंत ध्यान देना चाहिए।

स्वास्थ्य व्यवस्था आईसीयू में, सरकार केवल उद्घाटन और प्रचार में व्यस्त — शैलेन्द्र भारतीय जनता पार्टी सोलन शहरी मंडल के अध्यक्ष शैलेन्द्र ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। सरकार नए अस्पतालों की इमारतों, उद्घाटनों और फीते काटने को अपनी उपलब्धि बताने में व्यस्त है, जबकि धरातल पर मरीज डॉक्टरों, विशेषज्ञ चिकित्सकों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। अस्पतालों की असली पहचान उनकी इमारतों से नहीं, बल्कि वहां उपलब्ध गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाओं से होती है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 में नीति आयोग एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की स्वास्थ्य रैंकिंग में हिमाचल प्रदेश "फ्रंट रनर" राज्यों में शामिल था, लेकिन वर्ष 2026 तक प्रदेश कई पायदान नीचे खिसक गया है और अब राष्ट्रीय मानकों तक पहुंचने के लिए भी संघर्ष कर रहा है। यह गिरावट वर्तमान सरकार की स्वास्थ्य क्षेत्र में विफल नीतियों का परिणाम है। शैलेन्द्र ने कहा कि पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में प्रदेश के बजट का लगभग 6.7 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च किया जाता था। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश को बिलासपुर में एम्स (AIIMS) जैसा विश्वस्तरीय संस्थान मिला, जिससे प्रदेश के लाखों लोगों को आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हुईं। इसके साथ ही शिमला के चामियाना में अटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशियलिटीज़ (AIMSS) और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार भी भाजपा सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि रही। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में हिमाचल प्रदेश को स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए ₹1,454 करोड़ की अतिरिक्त वित्तीय सहायता भी प्रदान की, लेकिन इसके बावजूद प्रदेश के अस्पतालों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की भारी कमी बनी हुई है। सरकार को जनता को बताना चाहिए कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं दिखाई दे रहा। शैलेन्द्र गुप्ता ने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने सरकार के सभी दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार चंबा सहित अनेक जिलों में डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ के बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं। प्रदेश के अधिकांश CHC और PHC विशेषज्ञ डॉक्टरों के बिना चल रहे हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों की जनता सबसे अधिक प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि प्रदेश के कई अस्पतालों में गायनेकोलॉजिस्ट के बिना हजारों प्रसव कराए गए। कंडाघाट के सिविल अस्पताल में भी स्त्री रोग विशेषज्ञ की अनुपस्थिति के बावजूद 179 प्रसव कराए गए, जो माताओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ है। सरकार को बताना चाहिए कि विशेषज्ञ डॉक्टरों के बिना इस प्रकार की सेवाएं कैसे संचालित होती रहीं। शैलेन्द्र ने कहा कि करोड़ों रुपये खर्च कर एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और अन्य आधुनिक मशीनें तो खरीद ली गईं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए रेडियोग्राफर और तकनीकी स्टाफ की नियुक्ति नहीं की गई। परिणामस्वरूप कई अस्पतालों में ये मशीनें वर्षों से धूल फांक रही हैं और मरीजों को निजी अस्पतालों में महंगा इलाज करवाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सोलन जिला अस्पताल में योग्य और अनुभवी डॉक्टरों की अच्छी टीम होने के बावजूद अस्पताल का प्रबंधन पूरी तरह अव्यवस्थित दिखाई देता है। मरीजों और उनके तीमारदारों को इलाज से अधिक व्यवस्थाओं की मार झेलनी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि एक मरीज को डॉक्टर से मात्र पांच मिनट परामर्श लेने के लिए कई-कई घंटे अस्पताल में संघर्ष करना पड़ता है। पहले पर्ची के लिए लाइन, फिर जांच लिखवाने के लिए लाइन, उसके बाद टेस्ट करवाने के लिए लाइन, फिर शुल्क जमा करवाने के लिए अलग लाइन और अंत में रिपोर्ट लेकर दोबारा डॉक्टर को दिखाने के लिए फिर घंटों इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था में मरीज की हालत क्या होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जब एक स्वस्थ व्यक्ति भी घंटों लाइन में लगकर थक जाता है, तो गंभीर मरीज, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और दिव्यांग किस पीड़ा से गुजरते होंगे। शैलेन्द्र ने कहा कि प्रदेश के जिला अस्पताल आज उपचार केंद्र कम और रेफरल सेंटर अधिक बनते जा रहे हैं। शिमला, धर्मशाला, हमीरपुर, सिरमौर, कुल्लू और सोलन सहित अनेक अस्पतालों से मरीजों को विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव में आईजीएमसी शिमला और टांडा मेडिकल कॉलेज रेफर किया जा रहा है। इससे मरीजों का समय, पैसा और कई बार उनका जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की कि स्वास्थ्य विभाग में रिक्त पड़े सभी डॉक्टरों, सुपर स्पेशलिस्ट, नर्सों, तकनीकी कर्मचारियों और पैरामेडिकल स्टाफ के पदों को तत्काल भरा जाए। जिला अस्पतालों की प्रबंधन व्यवस्था को आधुनिक और जवाबदेह बनाया जाए, ताकि मरीजों को घंटों लाइन में खड़े रहने की बजाय समय पर उपचार मिल सके। अंत में शैलेन्द्र गुप्ता ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की जनता को अब विज्ञापन, उद्घाटन और झूठे दावों की नहीं, बल्कि समय पर इलाज, विशेषज्ञ डॉक्टर और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है। स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता के जीवन से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है। सरकार को प्रचार छोड़कर अस्पतालों की वास्तविक स्थिति सुधारने पर तुरंत ध्यान देना चाहिए।

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