बेतिया में स्वास्थ्य सेवा के नाम पर मौत की मंडी,नारायणी हॉस्पिटल में बिना डिग्री के चल रहा अवैध चीर-फाड़ का साम्राज्य, स्टिंग में तथाकथित डॉक्टर डीपी सिंह के फर्जीवाड़े और दलाली के खेल का हुआ महाखुलासा
बेतिया शहर के एक अति पॉश और वीआईपी इलाके में चिकित्सा के पवित्र पेशे को कलंकित करते हुए इंसानी जिंदगियों का खुला कत्लखाना चलाया जा रहा है। नारायणी हॉस्पिटल के नाम पर संचालित इस निजी अस्पताल में तथाकथित डॉक्टर डीपी सिंह द्वारा भोले-भाले मरीजों की जान के साथ बेखौफ खिलवाड़ किया जा रहा है। अस्पताल के मुख्य बोर्ड से लेकर मरीज के पर्चे तक पर डॉक्टर की डिग्री और शैक्षणिक योग्यता का कोई अता-पता नहीं है, लेकिन इसके बावजूद यहां रोजाना बेहद गंभीर मरीजों के बड़े-बड़े ऑपरेशन और चीर-फाड़ को बेधड़क अंजाम दिया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर यह गंभीर चर्चा है कि डॉक्टर साहब बिना किसी मान्यता प्राप्त और वैध मेडिकल डिग्री के ही इस पूरे अस्पताल का संचालन कर रहे हैं।
हमारे संवाददाता द्वारा किए गए विस्फोटक स्टिंग ऑपरेशन में इस काले धंधे की एक-एक परत पूरी तरह उधड़ कर सामने आ गई है। सामने आए पहले ऑडियो टेप में तथाकथित डॉक्टर डीपी सिंह खुलेआम यह जानलेवा दावा करते सुनाई दे रहे हैं कि मरीज के शरीर में चाहे खून की कितनी भी भारी कमी क्यों न हो, ऑपरेशन हर हाल में कर दिया जाएगा। मेडिकल साइंस के बुनियादी नियमों को ताक पर रखकर खून की गंभीर कमी वाले मरीजों को सीधे ऑपरेशन टेबल पर ले जाने की यह बात साबित करती है कि यहां मरीज का इलाज नहीं, बल्कि केवल पैसे ऐंठने के लिए उसकी जान का सौदा किया जा रहा है।
इतना ही नहीं, दूसरे ऑडियो में तो बेशर्मी और फर्जीवाड़े की सारी हदें पार हो गईं। जब हमारे संवाददाता ने एक गंभीर मरीज का परिजन बनकर डॉक्टर साहब से बातचीत की और उनकी मेडिकल डिग्री के बारे में सवाल पूछा, तो तथाकथित डॉक्टर डीपी सिंह ने खुद को लौरिया का सरकारी चिकित्सा पदाधिकारी और एमबीबीएस डिग्रीधारी घोषित कर दिया। सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि अगर डॉक्टर साहब सच में एमबीबीएस जैसी प्रतिष्ठित डिग्री धारक हैं, तो क्लिनिक के साइनबोर्ड या प्रिस्क्रिप्शन पर उस डिग्री का नामोनिशान क्यों गायब है? और यदि उनके पास यह वैध डिग्री नहीं है, तो फिर किस मजबूरी या साजिश के तहत मरीजों और उनके परिजनों को खुलेआम गुमराह कर एमबीबीएस होने का झूठा दावा किया जा रहा है?
बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब की कथित चिकित्सा का असली कारोबारी चेहरा भी बेनकाब हो गया। स्टिंग के दौरान डॉक्टर डीपी सिंह ने संवाददाता से यह तक कह डाला कि "आप एक बार यहां आइए, उसके बाद आप खुद अपने साथ पांच और लोगों को लेकर आइएगा।" यह बयान साफ दर्शाता है कि अस्पताल के भीतर इलाज की जगह मरीज जुटाने की नेटवर्किंग और दलाली का संगठित रैकेट चलाया जा रहा है, जहां मरीजों को इंसान नहीं बल्कि कमीशन और कमाई का जरिया समझा जाता है।
इस पूरे प्रकरण ने सरकारी स्वास्थ्य तंत्र और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि तथाकथित डॉक्टर साहब लौरिया में सरकारी पद पर पदस्थापित चिकित्सा पदाधिकारी हैं, तो वह पूरे दिन बेतिया में अपने निजी क्लिनिक में बैठकर निजी ऑपरेशन का गोरखधंधा कैसे चला रहे हैं? उनकी वास्तविक सरकारी ड्यूटी कब और कहां होती है, या फिर सरकारी खजाने से सिर्फ वेतन उठाकर निजी क्लिनिक में अवैध वसूली का खेल चल रहा है? स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, स्वास्थ्य महकमे के ऊपर बैठे एक रसूखदार अधिकारी के सीधे संरक्षण और गुप्त मिलीभगत के दम पर ही यह पूरा अवैध साम्राज्य बेखौफ संचालित हो रहा है, जिसकी एवज में प्रशासनिक कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। हालांकि इस बात की पुष्टि मेरे द्वारा नहीं किया जा रहा यह जांच का विषय है परंतु हद तो तब हो गई जब इस गंभीर और जानलेवा फर्जीवाड़े के संदर्भ में बेतिया के सिविल सर्जन से सीधी बात की गई। सिविल सर्जन ने पूरे मामले से अपना पल्ला झाड़ते हुए एक रटा-रटाया बयान थमा दिया कि यह सारा मामला और कार्रवाई का अधिकार क्षेत्र केवल राज्य स्तर का है, उनके स्तर से इस पर कुछ नहीं किया जा सकता। जिले के सर्वोच्च स्वास्थ्य अधिकारी की यह गैर-जिम्मेदाराना चुप्पी और अनदेखी सीधे तौर पर इस बात का प्रमाण है कि सिस्टम की मिलीभगत से यह अवैध खेल फल-फूल रहा है। बिना डिग्री और अवैध ऑपरेशन के चलते आए दिन बेकसूर मरीजों की असमय मौतों का सिलसिला जारी है। अब देखना यह होगा कि इस महाखुलासे के बाद जिला प्रशासन और राज्य का स्वास्थ्य महकमा इस झोलाछाप तंत्र और उसके संरक्षणदाताओं पर सख्त कानूनी शिकंजा कसता है या फिर बेतिया की जनता को यूं ही फर्जी डॉक्टरों के हाथों लुटने और मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा।