कल कलेक्ट्रेट में गूंजा था संदेश—लापरवाही नहीं चलेगी, आज जल संसाधन विभाग में 45 हजार की रिश्वत का खेल पकड़ा गया!
कल ही नवागत कलेक्टर हर्ष सिंह अधिकारियों को समझा रहे थे कि जनता के काम समय पर हों, फाइलें न अटकें और जिम्मेदारी से मुकरने वालों पर कार्रवाई हो। लेकिन लगता है कि कुछ सरकारी फाइलों की रफ्तार बढ़ाने के लिए नियम-कायदों से ज्यादा नोटों की ताकत जरूरी समझी जा रही थी!
मझगांय बांध की नहर का बिल पास करने के एवज में मांगी गई रिश्वत!
सागर लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई में जल संसाधन विभाग के डिविजनल एकाउंटेंट दीपक परिहार को 15 हजार और लिपिक अरविंद पाठक को 30 हजार रुपये की कथित रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया। कुल रकम—45 हजार रुपये!
ठेकेदार के तीन भुगतान हो चुके थे, लेकिन चौथे और अंतिम बिल के लिए कथित तौर पर रिश्वत की मांग की जा रही थी। ठेकेदार की शिकायत पर लोकायुक्त ने कार्रवाई की।
अब जरा व्यवस्था का यह गणित देखिए!
काम ठेकेदार करे, पैसा सरकार दे, लेकिन बिल पास कराने के लिए जेब ठेकेदार की कटे!
जनता और ठेकेदार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाएं, मगर कुछ लोगों के लिए बिना चढ़ावे के फाइल आगे बढ़ाना मुश्किल हो जाए!
एक तरफ कलेक्टर की चेतावनी—काम समय पर करो, दूसरी तरफ रिश्वत के आरोप में गिरफ्तारी!
अब सवाल यह है कि क्या सरकारी दफ्तरों में फाइलें नियमों से चलेंगी या नोटों के इशारे पर?
व्यंग्य अपनी जगह, लेकिन मामला गंभीर है। सरकारी व्यवस्था जनता की सेवा के लिए है, किसी की जेब भरने के लिए नहीं। लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद अब जांच और कानूनी प्रक्रिया से ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
आखिर सरकारी काम कराने के लिए रिश्वत क्यों? क्या बिना चढ़ावे के फाइल आगे नहीं बढ़ सकती?
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