पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने झीरम घाटी हमले पर आए अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हम न्यायपालिका का सम्मान करते हैं, लेकिन इसे पूर्ण न्याय नहीं कहा जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जांच एजेंसी NIA के मुताबिक घटना में 200 से अधिक नक्सली शामिल थे, तो सिर्फ 10 लोगों को सजा सुनाकर बाकी 190 आरोपियों को किसके भरोसे छोड़ दिया गया? इसके अलावा, हमले की मूल FIR में जिन शीर्ष नक्सली नेताओं के नाम दर्ज थे, उन्हें मौजूदा फैसले और चार्जशीट से बाहर कैसे कर दिया गया?
बघेल ने आरोप लगाया कि सुरक्षा में हुई गंभीर चूक को तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी स्वीकारा था, फिर भी सुरक्षा एजेंसियों या किसी भी जिम्मेदार अधिकारी से कोई ठोस पूछताछ नहीं की गई। उन्होंने इसे केवल नक्सलियों का हमला न मानकर "नक्सली, सुरक्षा अधिकारी और राजनेता" के त्रिकोण से रचा गया एक बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया। इतने वर्षों बाद भी झीरम घाटी के प्रत्यक्षदर्शियों और जेल में बंद आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों के बयान दर्ज न करना NIA की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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