*हमे जीवन में सुख चाहिए तो दूसरों को दुःख देना बंद कर दे-आचार्य रामदयालजी महाराज*
*सद्गुरू के सामर्थ्य से ही राग भरे जीवन में होती वैराग्य की स्थापना*
*माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में दैनिक चातुर्मासिक सत्संग*
भीलवाड़ा: निलेश काठेड़ (वरिष्ठ पत्रकार) ,4 अगस्त हमे मानव शरीर तो परमात्मा प्रदान करता है पर इस शरीर का कल्याण सद्गुरू के सामर्थ्य से ही होता है। गुरू का सामर्थ्य होता है तो राग भरे जीवन में भी वैराग्य की स्थापना कर देते है।
भवसागर में डूबने के लिए जगह परमात्मा देता है पर गुरू का सामर्थ्य होता है तो भवसागर से पार कर देते है। गुरू का सामर्थ्य ही यम में त्रास से मुक्त दिला सकता है।
ये विचार अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने मंगलवार को विश्व शांति कल्याण चातुर्मास के तहत दैनिक सत्संग में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि स्वामी रामचरणजी महाराज ने समर्थ गुरू के चरणों में बैठकर जिस सामर्थ्य को पाया उसे अभिव्यक्त किया है। सद्गुरू की कृपा से ही जीवन में अज्ञान का अंधकार दूर होकर ज्ञान का प्रकाश होता है।
जीव का सामर्थ्य नहीं है कि वह देखे पर परमात्मा व गुरू के सामर्थ्य से वह देख पाता है। पुरूषार्थ हमारा होता है पर सामर्थ्य गुरूदेव का होता है।
आचार्यश्री ने कहा कि इस संसार में वहीं हमारा खास होना चाहिए जो सत्संग में भी हमारे साथ आए। मात्र आमोद प्रमोद में साथ देने वाला खास नहीं हो सकता है। हम रिश्ते नाते में उलझे रहते है जबकि जन्म मरण का सिलसिला अनंत है ओर जीवात्मा के शरीर बदलते ही रिश्ता बदल जाता है। मात्र परमात्मा से ही हमारा रिश्ता स्थाई हो सकता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में सुख चाहते है तो किसी को दुःख नहीं देना चाहिए। जीवन में माता - पिता, पति- पत्नी, संतान -मित्र जिनसे भी हम सुख की कामना करते है उन्हें दुःख नहीं देना चाहिए। जो व्यवहार तुम्हे अपने लिए पसंद नहीं वैसा व्यवहार आप सामने वाले के साथ भी नहीं करे। हमे सम्मान का अमृत चाहिए तो दूसरों के लिए अपमान का हलाहल तैयार नहीं करे।
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था का नाम संत होता है। जो महानता प्रदान करे वह संत होता है। जब तक ज्ञान हमारे पास नहीं है हम गुरू की समर्थता के पात्र नहीं बन सकते है। गुरू के सामर्थ्य से जो ज्ञान होगा उससे भक्ति बढ़ती है ओर जो भक्ति सद्गुरू के सामर्थ्य से बढ़ती है उससे वैराग्य बढ़ेगा।
जीवन में सद्गुरू की कृपा से ही मुक्ति मिलेगी।
उन्होंने कहा कि जिसे गुरू प्यारा नहीं होता उससे बड़ा बदनसीब कोई नहीं है। आजकल लोग अपना स्वार्थ पूरा नहीं होने पर गुरू व गोविन्द को कोसने में भी देर नहीं करते। जीव का सुखी या दुःखी होना कर्मवाद है पर परमात्मा की भक्ति प्राप्त होना गुरू का समर्थवाद है।
सत्संग में भजन वहीं कर पाएगा जिस पर गुरू की कृपा होगी।
आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस पर प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
चातुर्मास में दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक है। रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती एवं रामस्नेही संप्रदाय के युवा संत श्री रामजस जी ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है।