वरिष्ठ समाजसेवी सबके चाहते "बशीर मामू" का 75 वर्ष की आयु में निधन
बशीर खान मैनेजर साहब: समाजसेवा और इंसानियत की मिसाल
सोहागपुर के प्रसिद्ध समाजसेवी बशीर खान मैनेजर साहब का 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को सुबह करीब 11 बजे भोपाल के जेके हॉस्पिटल में उपचार के दौरान 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से सोहागपुर सहित आसपास के क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। परिजन उनके पार्थिव शरीर को गृह नगर सोहागपुर लेकर पहुंचे, जहां ईशा की नमाज के बाद बड़ी कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और मगफिरत के लिए दुआ की। अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ उनके प्रति लोगों के प्रेम, सम्मान और आत्मीय जुड़ाव को दर्शा रही थी। लोगों के बीच ‘बशीर मामू’ के नाम से मशहूर उनका जाना क्षेत्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
बच्चों की शादी से लेकर शिक्षा तक, जरूरतमंदों के बने सहारा
बशीर खान मैनेजर साहब की पहचान एक ऐसे समाजसेवी के रूप में रही, जो जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने कई बच्चों की शादी में आर्थिक सहयोग किया और जरूरतमंद विद्यार्थियों की शिक्षा में भी मदद की। उनके पास अपनी परेशानी लेकर आने वाला कोई व्यक्ति निराश नहीं लौटता था। इसी सेवाभावी स्वभाव के कारण लोग उन्हें प्यार से ‘बशीर मामू’ कहते थे। उन्होंने अपने भाइयों और भतीजों को भी हमेशा साथ लेकर चले और शादी-विवाह, शिक्षा, बीमारी सहित पारिवारिक परेशानियों में आर्थिक सहयोग किया।
आबकारी विभाग में 40 वर्ष से अधिक की सेवा, सादगी रही पहचान
बशीर मामू ने आबकारी विभाग में 40 वर्ष से अधिक समय तक मैनेजर के रूप में सेवाएं दीं। लंबे सेवाकाल के दौरान उन्होंने अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच सम्मान हासिल किया। आबकारी विभाग में कार्य करने के बावजूद उन्होंने कभी शराब का सेवन नहीं किया। सरकारी सेवा के साथ-साथ वे सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे। पद और प्रतिष्ठा के बावजूद उनकी सादगी बरकरार रही और वे आम लोगों के बीच सहजता से मिलते-जुलते थे।
पंडित जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय में नागरिक सम्मान से नवाजे गए
समाज के प्रति उनके योगदान को देखते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय में आयोजित अलंकरण समारोह में बशीर मामू को नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया। जरूरतमंद परिवारों की सहायता, बच्चों की शिक्षा में सहयोग और सामाजिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय भागीदारी उनके व्यक्तित्व की विशेषताएं रहीं। यह सम्मान क्षेत्र में उनके योगदान और लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
फरीद बाबा के उर्स में मशहूर कव्वालों को करते थे आमंत्रित
पलकमति नदी के किनारे स्थित फरीद बाबा की मजार से बशीर मामू का विशेष लगाव था। वे यहां आयोजित उर्स के बड़े कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाते और देश के मशहूर कव्वालों को आमंत्रित करते थे। प्रसिद्ध कव्वाल हाजी असलम साबरी को उन्होंने दो बार सोहागपुर बुलाया था। उस दौर में उनकी विश्वविख्यात कव्वाली ‘मोहम्मद के शहर में’ काफी चर्चित थी। इन आयोजनों की चर्चा होशंगाबाद सहित आसपास के जिलों तक होती थी। धार्मिक आयोजनों के माध्यम से उन्होंने शहर की सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में भी योगदान दिया।
वक्फ कायमखानी मस्जिद में 20 वर्ष से अधिक समय तक निभाई जिम्मेदारी
गांधी वार्ड स्थित वक्फ कायमखानी मस्जिद में बशीर मामू ने 20 वर्ष से अधिक समय तक निस्वार्थ भाव से अध्यक्षता की। धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में उनकी सक्रियता ने उन्हें समाज के बीच विशेष पहचान दिलाई। वे लोगों के सुख-दुख में शामिल होते थे और विवाह से लेकर अंत्येष्टि तक सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने में आगे रहते थे। उनकी सहजता और अपनत्व के कारण लोग उनसे आत्मीय संबंध महसूस करते थे।
सादगी और इंसानियत से बनाई लोगों के दिलों में जगह
बशीर मामू का जीवन समाजसेवा, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सादगी का उदाहरण रहा। वे बिना किसी दिखावे के जरूरतमंदों की मदद करते, परिवार को साथ लेकर चलते और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। उनके निधन से समाज ने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया, जिसने अपने व्यवहार और कार्यों से लोगों के बीच सम्मान हासिल किया। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल लोगों की बड़ी संख्या इस बात की गवाह बनी कि बशीर मामू के चाहने वालों और उनसे आत्मीयता रखने वालों की कमी नहीं थी। उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्य और लोगों के साथ निभाए गए रिश्ते लंबे समय तक उनकी यादों को जीवित रखेंगे।
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Hoshangabad Nagar, Hoshangabad | Oct 12, 2026