टांडा मेडिकल कॉलेज में कथित स्टेंट घोटाले की जांच तेज, 74 फीसदी सस्ते एल-1 टेंडर को दरकिनार करने के आरोपों ने बढ़ाई विभागाध्यक्ष की मुश्किलें
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📍 कांगड़ा/टांडा
डा. राजेंद्र प्रसाद राजकीय मेडिकल कॉलेज टांडा के कार्डियोलॉजी विभाग में सामने आए कथित स्टेंट घोटाले की जांच अब निर्णायक दौर में पहुंचती नजर आ रही है। आरोप है कि 74 फीसदी सस्ते एल-1 टेंडर को दरकिनार कर रिजेक्ट की गई कंपनियों के महंगे स्टेंट मरीजों को लगाए गए। मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रशासन ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है।
मामले की उच्चस्तरीय जांच आईजीएमसी शिमला की प्राचार्या डा. सीता ठाकुर की अगुवाई वाली टीम कर रही है। जांच समिति ने कार्डियोलॉजी विभाग की पिछली खरीद से जुड़े टेंडर दस्तावेज, खरीद रिकॉर्ड और बिलिंग से संबंधित दस्तावेज अपने कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी है। अब यह पता लगाया जा रहा है कि टेंडर प्रक्रिया में अयोग्य या रिजेक्ट कंपनियों के स्टेंट अस्पताल के इन्वेंट्री रूम तक कैसे पहुंचे और उनके बिलों का भुगतान किस स्तर पर स्वीकृत किया गया।
मरीजों की फाइलों की भी जांच
जांच के दौरान विवादित अवधि में स्टेंट लगवाने वाले हृदय रोगियों की मेडिकल फाइलों को भी खंगाला जा रहा है। जांच टीम यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित मरीजों से कितनी राशि ली गई और क्या महंगे स्टेंट की कीमत का भुगतान हिमकेयर या आयुष्मान भारत जैसी कैशलैस स्वास्थ्य योजनाओं के माध्यम से भी किया गया था।
इसके अलावा जांच का एक अहम पहलू कथित आर्थिक लाभ और कमीशन से भी जुड़ा है। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि स्टेंट की खरीद में किसी तरह का कमीशन या आर्थिक लेन-देन हुआ था या नहीं। इसके लिए संबंधित सप्लायर कंपनियों के प्रतिनिधियों और अस्पताल के कर्मचारियों के बीच संपर्क तथा मुलाकातों से जुड़े रिकॉर्ड की भी पड़ताल किए जाने की बात सामने आई है।
सप्लायर कंपनियों पर भी कार्रवाई की तैयारी
स्वास्थ्य निदेशालय स्तर पर उन सप्लायर कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू किए जाने की जानकारी है, जिन पर टेंडर में रिजेक्ट होने के बावजूद कथित तौर पर अस्पताल में स्टेंट की सप्लाई करने के आरोप हैं। जांच में आरोप सही पाए जाने पर संबंधित कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की कार्रवाई भी हो सकती है।
राज्य सरकार और स्वास्थ्य मुख्यालय ने मामले को गंभीरता से लिया है। जांच में आरोप सिद्ध होने की स्थिति में संबंधित चिकित्सकों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ निलंबन तथा पुलिस में एफआईआर जैसी सख्त कार्रवाई भी संभव है। साथ ही भविष्य में मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा उपकरणों की खरीद प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने और खरीद व्यवस्था को केंद्रीकृत करने के लिए सख्त एसओपी तैयार किए जाने की दिशा में भी काम चल रहा है।
“जांच पूरी होने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा”
जांच समिति की प्रमुख सदस्य एवं आईजीएमसी शिमला की प्राचार्या डा. सीता ठाकुर ने कहा कि मामले की जांच अभी शुरू हुई है और रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने के बाद ही इस मामले में कुछ कहा जा सकेगा।
फिलहाल जांच टीम का फोकस खरीद प्रक्रिया, टेंडर दस्तावेज, स्टेंट की सप्लाई, मरीजों की मेडिकल फाइलों और भुगतान रिकॉर्ड को जोड़कर पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने लाने पर है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित अनियमितताओं के लिए कौन जिम्मेदार है और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।
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